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जीवन को COLOURFULL बनाना है ? 3 C से दूर रहो । KC GURJJI । KULDARSHAN VIJYJI । ALPHABET SEARIES 2023

GuruPrem Mission

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[0:00]अल्फाबेट सीरीज के ऊपर हम बात कर रहे हैं। पहले दिन हमने बात करी लाइफ को ए वन बनाना है तो तीन ए चाहिए। कल हमने बात करी कि लाइफ को ब्यूटीफुल बनाना है तो तीन बी चाहिए। बैलेंसर लाइफ होनी चाहिए हमारी हर तरह से संतुलन बनाना हमें आना चाहिए। जीवन में धर्म अर्थ काम मोक्ष चारों का संतुलन बनाना यदि हमें जीवन में आ जाए तो कहीं न कहीं हमारे जीवन का कल्याण हो सकता है। आज तीसरी सीरीज बात करनी है। ए बी और तीसरा वर्ड है सी। कहा कि सी में थोड़ी अलग बात है। ए कहता है कि लाइफ को ए वन बनाओ बी कहता है लाइफ को ब्यूटीफुल बनाओ सी कहता है कि लाइफ को कलरफुल बनाओ। हमारा जीवन बड़ा नीरस होता जा रहा है। जीवन में कहीं उमंग नहीं दिखाई पड़ता, जीवन में कहीं उत्साह दिखाई नहीं पड़ता, जीवन में कहीं आनंद दिखाई नहीं पड़ता, जीवन में कहीं एक भीतर का एहसास पता नहीं चलता और जीवन के रंग धीरे-धीरे निस्तेज बनते जा रहे हैं। लाइफ कलरफुल हो। रंगों से भरा हुआ हमारा जीवन हो। इसी ने कहा कि लाइफ को यदि कलरफुल बनाना है तो तीन सी को लाना नहीं पड़ेगा तीन सी को निकालना पड़ेगा। कहा ये तीन सी ऐसे हैं जो हमारी लाइफ को कलरफुल नहीं बनने देते। और आज का इंसान यह तीन सी में फंसा हुआ है। जब हम सुनेंगे समझेंगे जाचेंगे परखेंगे तो हमें पता चलेगा आपको भी लगेगा कि नहीं कहीं न कहीं हमारा जीवन कहां फंसा हुआ है ये तीन सी में फंसा हुआ है। और ये तीन सी से बाहर निकल जाए ना तो निश्चित तौर पर हमारा जीवन कलरफुल बन सकता है। एक-एक वर्ड हमारे जीवन के लिए संदेश देता है। एक-एक वर्ड हमारे जीवन के लिए एक संदेश जगाता है कि जीवन कलरफुल होना चाहिए। जीवन में कहीं न कहीं रंग होने चाहिए, रंगों की ऊर्जा होनी चाहिए और वही रंग आपके जीवन को जीने का एक एहसास देता है। वही रंगों से हमारा जीवन बेहतर बनता है। संसार में जितनी भी चीजें हैं सभी आपको रंगीन चाहिए। हर चीज में आपको रंग पसंद आता है, लेकिन जीवन के रंग बिखर रहे हैं। जीवन के रंग उड़ रहे हैं, जीवन पूरा निस्तेज बन रहा है, जीवन में कहीं न कहीं रंग जा रहे हैं इसीलिए मैं आपसे कहना चाहता हूं कि जीवन को कलरफुल बनाना है तो तीन सी को जीवन से हटाना पड़ेगा। कहा पहला सी कौन सा? कहा कंपैरिजन। यह हमारे जीवन को कलरफुल नहीं बनने देता। जहां-जहां तुलनात्मक स्वभाव हमारा बन जाता है। हम हर जगह कंपैरिजन करने लग जाते हैं। हमेशा दूसरों से तुलना करने लग जाते हैं। हमारा यह स्वभाव बना हुआ है। हमेशा दूसरों से तुलना करते रहते हैं। इसके पास यह है, मेरे पास यह है, इसके पास ऐसा है, मेरे पास ऐसा है, इसके पास यह कहां से आया? मेरे पास यह क्यों नहीं आया? यही भावधारा हमारे मन में हमेशा चलती रहती है। इसीलिए मैं आपको कहना चाहता हूं कि जीवन को कलरफुल बनाना है तो कहीं न कहीं तीन सी को हटाना पड़ेगा। नंबर वन कंपैरिजन। आप एक 24 घंटे का ब्योरा निकालिए। 24 घंटे अपने आप को देखिए और अपने आप से पूछिए कि 24 घंटे में कितनी बार कंपैरिजन होता है। कितनी बार? सुबह से शाम तक हम यही काम करते हैं कंपैरिजन। धर्म के क्षेत्र में भी कंपैरिजन व्यवहार में भी कंपैरिजन, व्यापार में भी कंपैरिजन, घर में भी कंपैरिजन हर जगह पर हम कंपैरिजन करने में लगे हुए हैं। और इसीलिए कहीं न कहीं हमारे जीवन के रंग उड़ जा रहे हैं। कंपैरिजन आपके जीवन में स्ट्रेस पैदा करता है। आपको फील होगा कि इसके पास ज्यादा है, मेरे पास कम है। और हमारी दिक्कत, हमारी परेशानी है। कि हम कंपैरिजन कहां करते हैं? हमारे से जो आगे है, हमारे से जो बड़े हैं उसका करते हैं, हमारे जैसे छोटे हैं उसका नहीं करते। मैं तो कई बार कहता हूं कि यदि आपका स्वभाव है कंपैरिजन करने का, आप चाहते हो कि कंपैरिजन करना ही है तो अपने से छोटों का करो आपको बड़ा आनंद आएगा। इसके पास कुछ नहीं है, मेरे पास इतना सारा है। यह भाव मन में खड़ा होगा, लेकिन तुम्हारे से बड़े लोगों का कंपैरिजन करोगे, जो तुम्हारे से शक्ति में बड़े हैं, जो तुम्हारे से संपत्ति में बड़े हैं, जो तुम्हारे से सामर्थ्य में बड़े हैं, जो तुम्हारे से सत्ता में बड़े हैं, उन लोगों के साथ तुम्हारा कंपैरिजन होगा तो होगा क्या? कहीं न कहीं तुम्हारी लाइफ में लो फील करोगे। और जितना हम लो फील करते हैं उतना स्ट्रेस बढ़ता है। जितना यह मन की मेंटालिटी है समझना। जितना आपको यह लगेगा कि मेरे पास कम है, मेरे पास कम है, मेरे पास कम है, मेरे पास कम है उतना आपके जीवन में स्ट्रेस बढ़ता जाएगा। उतना आप धर्म से विमुख होते चले जाओगे, उतना कहीं न कहीं परिवार से विमुख होते चले जाओगे, वह चीजों को पाने के लिए आप दौड़ते रहोगे, इसलिए मैं आपसे कहना चाहता हूं कि जीवन को कलरफुल बनाना है तो तीन सी को जीवन से निकालना पड़ेगा। सबसे पहले नंबर में सबसे पहले नंबर में कंपैरिजन नंबर टू कंपटीशन एंड नंबर थ्री कैलकुलेशन। जब जब तुलनात्मक स्वभाव हमारा बढ़ता है तो क्या होता है? हम स्पर्धा करने लग जाते हैं। तुलना करके हम रुक नहीं जाते। आपने किसी के वस्त्र देखे, आपने किसी की कार देखी, आपने किसी के पास कोई व्हीकल देखा, आपने किसी का घर देखा, आपने किसी के हाथ में मोबाइल देखा, आपने किसी ने पहने हुए गहने देखे, जो भी आप देखते हो, आप देखकर रुक नहीं जाते आप स्पर्धा करते हो। पहले तुलना, फिर स्पर्धा। अब स्पर्धा क्या है कि मेरे पास यह कैसे आ जाए। कंपटीशन। आज आप इतना भाग रहे हो उसके पीछे की वजह एक ही है, कंपटीशन। आपके घर में कोई कमी नहीं है। आपके पास बहुत कुछ है, बहुत ज्यादा है। संसार में करोड़ों लोग जिस चीज की जिस चीज की चाहना करते हैं बराबर समझना। संसार में करोड़ों लोग जिस चीज की चाहना करते हैं वह चीज आपको अनायास मिल गई है। ऐसी इतनी सारी चीजें आपके जीवन में है, जो आपको अनायास मिल गई है जिसके लिए संसार के करोड़ों लोग भाग रहे हैं, दौड़ रहे हैं, परमात्मा से मिन्नतें कर रहे हैं कि कहीं न कहीं हमें यह चीज प्राप्त हो जाए, हमें इतनी संपत्ति प्राप्त हो जाए, हमें इतनी शक्ति प्राप्त हो जाए, हमें इतने संबंध प्राप्त हो जाए वह चीज आपको अनायास प्राप्त हो गई है, फिर भी आप दौड़ रहे हैं। संसार में करोड़ों लोगों के पास जो चीज नहीं है वह चीज आपको मिल गई है फिर भी आप दौड़ रहे हो क्योंकि आपके जीवन में स्पर्धा का भाव है। पहले तुलना आती है, फिर स्पर्धा खड़ी होती है। आप किसी के साथ अपना कंपैरिजन करते हो और उसके बाद में जब हम कंपैरिजन करते हैं तो कंपैरिजन करके रुक नहीं जाते। तुलना करके हम रुक नहीं जाते, तुलना करने के बाद हम स्पर्धा में आते हैं और भागते जीवन भर भागते रहते हैं। और शायद हमारा मन ऐसा है। हमने जो गोल बनाया, हमने जो लक्ष्य बनाया वह अचीव भी हो जाए तो नया लक्ष्य हमारे सामने खड़ा कर देता है। कई लोगों की भावना होती है कि महाराज साहब। हमारे घर का घर हो जाए बस इतनी इच्छा है इसके लिए भाग रहे हैं दौड़ रहे हैं, गुरुदेव से आशीर्वाद लेते हैं, परमात्मा से प्रार्थना करते हैं और घर हो भी जाए। लेकिन जिस दिन घर में रहने जाओगे उस दिन ठीक है दो चार पांच दस दिन ठीक है, महीना दो महीना ठीक है, लेकिन उसके बाद में क्या होगा कि मन में एक नया विचार खड़ा होगा कि अभी तक फ्लैट था अब बंगला हो जाए तो अच्छी बात है। यह खत्म नहीं होता। कंपटीशन। अभी तक आप जब कहीं और रह रहे थे तब आप तब तक आप फ्लैट वालों को देख रहे थे, अब आपके पास फ्लैट आ गया तो आप फ्लैट वालों को नहीं देखते आप किसको देखते हो? बंगले वाले को देखते हो। अब आपके मन में यह स्पर्धा का भाव होगा कि मेरे पास बंगला कैसे आ जाए। और जीवन भर यही भाग दौड़ मची रहती है, जीवन भर यही भाग दौड़ में आप रहते हो, इसीलिए मैं आपसे कहना चाहता हूं कि जीवन में समझना स्पर्धा आपके जीवन को कहीं न कहीं कलरलेस कर देती है, आपके जीवन के रंगों को उड़ा देती है ये ताकत स्पर्धा के भीतर है। इसलिए बचने की कोशिश करो कि कहीं न कहीं कंपटीशन के भाव हमारे जीवन में खड़े ना हो। तीन सी आपके जीवन को कलरफुल नहीं बनने देते। पहले नंबर में, पहले नंबर में, पहले नंबर में कंपैरिजन नंबर टू कंपटीशन एंड नंबर थ्री कैलकुलेशन।

[8:55]हमेशा हम जो भी करते हैं एक कैलकुलेशन के साथ करते हैं। बिना गिनती के हम कोई अच्छा काम नहीं कर पाते। हमारे जीवन में हम कदम-कदम पर संभलना जरूरी है, लेकिन हमारे जीवन की परिस्थिति यह है, हमारे जीवन की कंडीशन यह है कि हम हम पूरा दिन अंकों में रहते हैं। सुबह से शाम तक गिनती में लगे रहते हैं। धर्म के क्षेत्र में भी गिनती। आज कितने परमात्मा की पूजा हुई? कैसी हुई कोई नहीं पूछता। कितने परमात्मा की पूजा हुई? आप देखना आज के आदमी की सबसे बड़ी दिक्कत यह है वह हमेशा कैलकुलेशन में रहता है। सुबह से शाम तक आप आंखें बंद करके फ्लैशबैक में जाए, आप आंखें बंद करके अपने आप को झाके, आप आंखें बंद करके अपने आप को देखें, आपको लगेगा कि सुबह से शाम तक मैंने क्या किया, गिनती की और कुछ नहीं किया। धर्म के क्षेत्र में भी गिनती। आज कितने भगवान की पूजा की? आज कितने सामायिक किए? यह महीने में कितने तपस्या करी, जीवन में कितना त्याग किया, कितनी चीजों को हमने छोड़ा हुआ है। हर जगह कितना और कितनी, कितना और कितनी, कितना और कितनी इसके पीछे ही हम भागते रहते हैं। कैसा यह देखने की हमने कभी कोशिश नहीं की। कैसा किया हम नहीं जानते। कितना किया बस उसी के भीतर हमारा लक्ष्य है लेकिन शास्त्रकार भगवंत कहते हैं कितना करने से कल्याण नहीं होगा कैसा करने से कल्याण होगा। तू कैसा कर रहा है? सामायिक एक हो लेकिन कैसी हो, परमात्मा की पूजा एक हो लेकिन कैसी हो, प्रतिक्रमण एक हो लेकिन कैसा हो, दान थोड़ा हो लेकिन कैसा हो, किसी के साथ बिताया हुआ समय भले थोड़ा हो लेकिन कैसा हो, कितने में मत फसो। हम कितने में फंस जाते हैं और इसीलिए दुखी होते जा रहे हैं। कैसा है यह सोचने की कोशिश करो। मैं तो कई बार कहता हूं कि कई बार हमें लोग मिलते हैं। गुरुदेव आज शंखेश्वर दादा के पक्षाल का लाभ लिया। और बाजू में श्रावक बैठे हुए होते हैं। जैसे वह सामने वाला व्यक्ति कहता है कि आज शंखेश्वर पार्श्वनाथ प्रभु के पक्षाल का लाभ मिला। सच कहना आपको कोई ऐसा कहने वाला मिल जाए तो पहला सवाल आपका क्या? पहला सवाल क्या है? कितना में मिला। एक का सवाल। एक ही सवाल आपकी आंखों के सामने आता है कितने में मिला? शंखेश्वर दादा के पक्षाल का लाभ मिला। जीवन में एक बार मिलने वाला वो लाभ है लेकिन कैसा रहा? कैसा तुझे फील हुआ? किस तरह से तेरा प्रक्षाल हुआ? किस तरह से तूने परमात्मा को स्पर्श किया? किस तरह से तूने परमात्मा की भक्ति की? कुछ आपके दिमाग में नहीं आता आपके दिमाग में पहला सवाल यही आता है कितने में मिला? कोई कहीं पर भी लाभ ले ले। लेकिन आपके मन में पहला ख्याल क्या कितने में मिला? कैसा मिला उससे आपको कोई लेना-देना नहीं है और इसीलिए मैं कहता हूं कि कम से कम धर्म के क्षेत्र में तो कैलकुलेशन से बाहर निकलो। यहां तो कैलकुलेशन मत लगाओ। हर चीज में आप कैलकुलेशन करते रहते हो। और इसीलिए मैं आपसे कहना चाहता हूं कि जीवन में समझना जीवन को यदि कलरफुल बनाना है, जीवन को बेहतर बनाना है, जीवन को सुंदर बनाना है तो कहीं न कहीं तीन सी हमारे जीवन से हटाने पड़ेंगे। सबसे पहले नंबर में सबसे पहले नंबर में कंपैरिजन नंबर टू कंपटीशन एंड नंबर थ्री बस यह तीन सी हमारे जीवन से निकल जाए ना तो निश्चित तौर पर हमारा जीवन कलरफुल बन सकता है।

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