[0:00]साल 1960 बॉम्बे। आजाद मैदान पुलिस स्टेशन। दरवाजे से एक शख्स अंदर दाखिल होता है।
[0:07]एकदम सफेद रंग का शानदार महंगा सूट। पैरों में चमचमाते सफेद जूते और उंगलियों के बीच सुलगती हुई विदेशी सिगरेट। उसके चेहरे पर खौफ का कोई नामोनिशान नहीं था। हैरान करने वाली बात यह थी कि उसे रोकने की हिम्मत किसी भी पुलिस वाले में नहीं थी। वह सीधे सीनियर इंस्पेक्टर के पास गया और आंखों में आंखें डालकर बोला, इसे थर्ड डिग्री मत देना। इसे छूना भी मत। मुझे बस 10 मिनट इससे बात करने दो। इंस्पेक्टर बिना एक शब्द कहे चुपचाप पीछे हट गया। वो सफेद सूट वाला शख्स अंधेरे लॉकअप की भारी लोहे की सलाखों के पास पहुंचा। अंदर जमीन पर एक आदमी बैठा था। फटी हुई बनियान और मैली सी धोती में। सलाखों के आर-पार जब इन दो बिल्कुल अलग दुनिया के लोगों ने एक दूसरे का हाथ थामा तो वहां मौजूद कोई नहीं जानता था कि इस एक हैंडशेक ने बॉम्बे की किस्मत का फैसला कर दिया है। यह कोई आम मुलाकात नहीं। यह उस खौफनाक पार्टनरशिप की शुरुआत थी जो आने वाले तीन दशकों तक पूरे सिस्टम को अपनी उंगलियों पर नचाने वाली थी।
[1:12]साल 1926 तमिलनाडु का एक बेहद पिछड़ा और सूखा हुआ गांव। वो दौड़ जब पूरा भारत अंग्रेजों की गुलामी में जकड़ा हुआ था और आजादी के लिए तड़प रहा था। इसी साल इसी राज्य के दो अलग-अलग इलाकों में दो लड़कों ने जन्म लिया। मस्तान मिर्जा और वरादराजन मुदलियर। मस्तान जब सिर्फ आठ साल का था तब उसके पिता उसे उस सूखे और भुखमरी से बचाने के लिए अपने साथ बॉम्बे ले आए। बॉम्बे पहुंचकर उन्हें क्रॉफर्ड मार्केट के पास एक छोटी गंदी सी मैकेनिक की दुकान में काम मिला। दिन भर दोनों बाप-बेटे ग्रीस, काले तेल और धूल में लिपटे रहते। भारी भरकम गाड़ियों के टायर खोलना, इंजन साफ करना और ऊपर से ब्रिटिश अफसरों की डांट फटकार सहना। यही उनकी रोजमर्रा की जिंदगी थी। दिन भर की हाड़तोड़ मेहनत के बाद रात को उनके हाथ में सिर्फ ₹5 आते थे। मस्तान के पिता बहुत ईमानदार इंसान थे। वह अक्सर उसके सिर पर हाथ फेर कर कहते मस्तान ईमानदारी की सूखी रोटी बेईमानी के मलाईदार गोश्त से बहुत बेहतर है। कभी कोई गलत रास्ता मत चुनना। मस्तान चुपचाप सिर हिला देता। लेकिन जब उसकी नजर उन चमचमाती रोल्स-रॉयस और मर्सिडीज गाड़ियों पर पड़ती तो उसके मन में एक सवाल उठता। ये सब मेरा कब होगा? क्या मैं पूरी जिंदगी ऐसे ही काम करता रहूंगा? उधर उसी उम्र का वरदराजन चेन्नई के एक फोटोग्राफी स्टूडियो में फर्श साफ करने और लोगों के झूठे बर्तन धोने का काम कर रहा था। पढ़ाई लिखाई उसके नसीब में नहीं थी। घर की हालत इतनी खराब थी कि दो वक्त की सूखी रोटी भी किसी लग्जरी से कम नहीं लगती थी। लेकिन वर्दा का दिमाग उसकी उम्र से कहीं ज्यादा तेज था। स्टूडियो में काम करते-करते उसने नोटिस किया कि जो लोग फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं दुनिया उनकी इज्जत करती है। उसने चुपचाप लोगों को सुन-सुनकर अंग्रेजी और तमिल दोनों भाषाओं पर शानदार पकड़ बना ली। साल 1944 तक हालात ने इन दोनों को बॉम्बे की कठोर सड़कों पर ला खड़ा किया। मस्तान ने मैकेनिक का काम छोड़ दिया और बॉम्बे डॉकयार्ड पर कुली बन गया। वहीं वर्दा ने वीटी स्टेशन पर लाल रंग की कुली की वर्दी पहन ली। एक ही राज्य से आए एक ही साल में जन्मे यह दो लड़के अब एक ही अनजान शहर में लगभग एक जैसा काम कर रहे थे। लेकिन दोनों की सोच और स्वभाव बिल्कुल अलग थे। मस्तान बेहद धार्मिक था। वह हर रोज सूफी संत बिस्मिल्लाह शाह की दरगाह पर जाता माथा टेकता और अपनी छोटी सी कमाई में से गरीबों को खाना खिलाता। 1947 में भारत आजाद हुआ लेकिन बॉम्बे में एक अलग ही तूफान अंदर ही अंदर पक रहा था। यह वह वक्त था जब उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और पूरे नॉर्थ इंडिया से हजारों लोग पैसा कमाने की चाह में बॉम्बे आ रहे थे। इनमें से कई भटके हुए नौजवान थे। जिन्हें काम नहीं मिला। पैसा कमाने की भूख उन्हें अंधेरे और खूनी रास्तों पर ले गई। रामपुरी गैंग, इलाहाबादी गैंग, कश्मीरी गैंग। यह सब भायखला और डोंगरी के इलाकों में पनपने लगे। वह राहगीरों को लूटते, हफ्ता वसूलते और खून बहाते। लेकिन ये सिर्फ गुंडे थे गली के मवाली। अंडरवर्ल्ड का असली सिंडिकेट अभी तैयार होना बाकी था। तभी साल 1952 में एक ऐसा फैसला आया जिसने बॉम्बे के पूरे गेम को पलट कर रख दिया। बॉम्बे प्रेसीडेंसी के तत्कालीन मुख्यमंत्री मोरारजी देसाई ने एक आदर्श समाज बनाने की चाह में पूरे राज्य में शराब पर पूरी तरह बैन लगा दिया। सिस्टम ने शराब बंद की लेकिन लोगों की तलब और प्यास को वो कैसे बंद करते। इसी प्यास को करोड़ों के कैश में बदलने के लिए मैदान में उतरा वरदराजन मुदलियर। वर्दा को समझ आ गया था कि ये सरकारी बैन उसके लिए कोई मुसीबत नहीं बल्कि लॉटरी का एक गोल्डन टिकट है। उसने एक पुराने शराब माफिया के साथ हाथ मिला लिया। सेंट्रल मुंबई के माटुंगा, सायन और धारावी के इलाकों में उसने अपना बेस बनाया। धारावी को वर्दा ने अपनी क्राइम कैपिटल में बदल दिया। रात के अंधेरे में वहां 100 से ज्यादा भट्टियां एक साथ जलती थी। एक रात में 120 लीटर से ज्यादा इल्लीगल देसी शराब बनती थी और उसे पूरे शहर में सप्लाई किया जाता था। लेकिन वर्दा सिर्फ एक शराब माफिया नहीं रहना चाहता था। उसने एक पूरा नेटवर्क खड़ा कर दिया। तमिलनाडु से जो भी गरीब बॉम्बे आता वह सीधा वर्दा के पास जाता। वर्दा उन्हें रहने के लिए झोपड़ी देता। सरकारी दफ्तरों से सेटिंग करके उनका राशन कार्ड बनवाता। बीएमसी से इल्लीगल पानी और बिजली का कनेक्शन देता। और बदले में उन मजदूरों को अपने शराब के धंधे में लगा देता। वो उनके लिए भगवान बन चुका था। प्रशासन और सरकार से बहुत पहले वर्दा लोगों की मदद करता था। धारावी जो आज एशिया की सबसे बड़ी स्लम मानी जाती है। उसे एक अभेद्य किले और अपने प्राइवेट वोट बैंक में बदलने वाला कोई और नहीं बल्कि वृद्ध राजन मुदलियार ही था। इधर सेंट्रल बॉम्बे में वर्दा शराब का बेताज बादशाह बन रहा था। और उधर समंदर किनारे बॉम्बे डॉकयार्ड पर मस्तान का तेज दिमाग कुछ और ही कैलकुलेट कर रहा था। कुली का काम करते हुए मस्तान ने एक चीज बहुत गहराई से नोटिस की। उसने देखा कि ब्रिटिश अधिकारी बाहर से आने वाले इलेक्ट्रॉनिक सामान, सोना और घड़ियों पर भारी कस्टम ड्यूटी लगाते थे। मस्तान ने सोचा कि ये टैक्स सिस्टम अंग्रेजों का बनाया हुआ है। अगर मैं कस्टम वालों की नजरों से बचकर इस सिस्टम को बाईपास करके सामान अंदर ले आऊं तो इसमें कुछ भी अनएथिकल या गलत नहीं है। ये कोई चोरी या डकैती नहीं है। ये सिर्फ एक अमीर सिस्टम को धोखा देना है। इसी दौरान डॉकयार्ड पर उसकी मुलाकात दुबई से आए एक बेहद अमीर अरब व्यापारी शेख मोहम्मद अल गालिब से हुई। गालिब का काम बॉम्बे में सोना स्मगल करना था। लेकिन उसे एक ऐसे लोकल लड़के की तलाश थी जो फुर्तीला हो। जिस पर कस्टम वालों को शक ना हो। और जो चुपचाप सोने की तस्करी कर सके। मस्तान ने बिना पलक झपकाए गालिब से हाथ मिला लिया। शुरुआत बहुत छोटी और रिस्की थी। मस्तान अपने माथे पर एक पट्टी बांधता। ऐसा दिखावा करता जैसे उसे चोट लगी हो। और उस पट्टी के अंदर सोने के दो बिस्कुट छिपा लेता। जो मस्तान कुली के तौर पर पूरे महीने कमर तोड़ मेहनत करके सिर्फ ₹15 कमाता था। अब वो सिर्फ एक चक्कर लगाने के ₹50 कमाने लगा था। लेकिन इस नए रास्ते में एक बहुत बड़ा रोड़ा था। शेर खान पठान। शेर खान पठान डॉकयार्ड का सबसे खूंखार गुंडा था। वह अपनी मर्जी से कुलियों से हफ्ता वसूलता था। वह आता कुलियों को जानवरों की तरह पीटता और उनकी दिन भर की खून पसीने की कमाई छीन ले जाता। मस्तान ने समझ लिया कि जब तक यह खौफ खत्म नहीं होगा। वह आजादी से अपना सोने का धंधा नहीं कर पाएगा। उसने डॉकयार्ड के 10 सबसे नौजवान और मजबूत कुलियों को इकट्ठा किया। रात के अंधेरे में उसने उनसे कहा, अगर आज इसे नहीं रोका तो यह जिंदगी भर हमारा खून पिएगा। आज या तो यह शेर खान डॉकयार्ड छोड़ देगा या हम सब। अगली सुबह जब शेर खान पठान अपने चार गुंडों के साथ हफ्ता वसूलने आया तो उसे अंदाजा नहीं था कि आज बगावत होने वाली है। मस्तान और उसके 10 लड़कों ने शेर खान को चारों तरफ से घेर लिया। उन्होंने शेर खान और उसके गुंडों को इतनी बुरी तरह पीटा कि शेर खान की रूह कांप गई। वो डॉकयार्ड छोड़कर ऐसा भागा कि फिर कभी उस इलाके में नजर नहीं आया। इस एक झड़प ने मस्तान को रातों रात कुलियों का लीडर और डॉकयार्ड का किंग बना दिया। गालिब मस्तान की इस लीडरशिप और बहादुरी से इतना इंप्रेस हुआ कि उसने उसे अपने स्मगलिंग के धंधे में सीधा 10% का पार्टनर बना लिया। लेकिन मस्तान की असली परीक्षा अभी बाकी थी। साल 1953 में पुलिस और कस्टम ने एक बड़ा जाल बिछाया और गालिब को धर दबोचा। उसे तीन साल की कड़ी सजा हो गई। गालिब के अरेस्ट होने से ठीक एक दिन पहले उसके नाम से सोने के बिस्कुट से भरी एक पूरी पेटी बॉम्बे पहुंची थी। मस्तान ने वह पेटी चुपचाप रिसीव कर ली थी। यहां कोई भी आम इंसान फिसल सकता था। मस्तान के पास करोड़ों रुपए का सोना था। गालिब जेल में सड़ रहा था। वह चाहता तो वह सोना लेकर बॉम्बे से कहीं भी गायब हो सकता था। अपनी एक नई आलीशान जिंदगी शुरू कर सकता था। लेकिन उस लालच के पल में मस्तान को अपने पिता की वह बात याद आई। ईमानदारी की सूखी रोटी। उसने वह सोने की भारी पेटी अपने मदनपुर मोहल्ले के छोटे से खस्ताहाल घर में पलंग के नीचे गड्ढा खोदकर छिपा दी और उस पर पुराने गंदे कपड़े डाल दिए। तीन साल तक वह उस दौलत के ऊपर सोता रहा। वह हर रोज गरीबी से लड़ता रहा। लेकिन उसने उस पेटी के एक सोने के बिस्कुट को भी हाथ नहीं लगाया। 1955 में जब गालिब जेल से बाहर आया तो वह पूरी तरह टूट चुका था। उसके पास अब एक फूटी कौड़ी नहीं थी। वो वापस दुबई भागने की सोच रहा था। मस्तान उसे अपने घर ले गया। उसने जमीन खोदी और सोने से भरी वह चमकती हुई पेटी बाहर निकाली। गालिब की आंखें फटी की फटी रह गई। उसे यकीन नहीं हो रहा था। मस्तान तुमने यह सोना लेकर भागने के बारे में कभी नहीं सोचा। तुम तो अमीर बन जाते। इस अंडरवर्ल्ड के धंधे में पैसा नहीं सिर्फ भरोसा चलता है गालिब भाई। मैं अपने उसूलों को धोखा नहीं दे सकता। यह ईमानदारी मस्तान का मास्टर स्ट्रोक साबित हुई। गालिब समझ गया कि ऐसा वफादार इंसान उसे पूरी दुनिया में नहीं मिलेगा। उसने तुरंत ऐलान किया कि आज से हर एक कंसाइनमेंट में मस्तान का सीधा 50% हिस्सा होगा और उस सोने की पेटी का आधा हिस्सा भी मस्तान का है। जो कल तक दूसरों का बोझ उठाता था। आज ₹500000 के साथ बॉम्बे का लखपति बन गया था। मस्तान मिर्जा अब बॉम्बे का डॉन हाजी मस्तान बनने की राह पर निकल चुका था। 1960 का दशक आते-आते हाजी मस्तान के पास बेहिसाब पैसा आ चुका था। वो दुबई, हांगकांग और मिडिल ईस्ट से महंगी घड़ियां, सोना और इलेक्ट्रॉनिक्स मंगवाता था। 1956 में उसने गुजरात के सबसे बड़े तस्कर सुकुर नारायण बखिया के साथ भी सिंडिकेट बना लिया था। मस्तान का पैसा अब पानी की तरह बह रहा था। लेकिन मस्तान सिर्फ एक अमीर स्मगलर नहीं रहना चाहता था। उसे पता था कि पैसा आपको बड़ी गाड़ियां और घर दे सकता है। लेकिन अगर आपको बॉम्बे जैसे शहर पर राज करना है तो आपके पीछे खौफ हथियार और लोगों की ताकत होनी चाहिए। मस्तान एक व्हाइट कॉलर क्रिमिनल था। वो खून खराबे और सड़कों की लड़ाई से खुद को दूर रखता था। वह सूट पहनता था और अंग्रेजी शराब पीता था। उसे बॉम्बे में राज करने के लिए एक ऐसी मसल पावर यानी बाहुबली की जरूरत थी जो उसके एक इशारे पर पूरे शहर में आग लगा सके। और उसे वो ताकत वो खौफ नजर आया वरदराजन मुदलियर में। वर्दा का खौफ इस कदर था कि पुलिस महकमे में उसके नाम से पसीने छूटते थे। अगर उसे किसी पुलिस स्टेशन में किसी बड़े अधिकारी से मिलने जाना होता तो उसके पहुंचने से पहले उस अधिकारी की टेबल पर एक प्रीमियम विदेशी भिसकी का ग्लास रख दिया जाता था। यह एक सिग्नल था। छोटे पुलिस वाले चुपचाप थाने से बाहर निकल जाते थे। सालाना ₹12 करोड़ का टर्नओवर था वर्दा का। पुलिस कमिश्नर से लेकर मंत्रालय के नेताओं तक। सबकी जेबें वर्दा भरता था। 1960 में एक बहुत बड़ी घटना हुई। केंद्र सरकार के एक बहुत बड़े मंत्री का एक सीक्रेट गैर कानूनी कंसाइनमेंट बॉम्बे पोर्ट पर आने वाला था। वर्दा के खुफिया नेटवर्क तक यह खबर पहुंच गई। वर्दा ने सोचा कि अगर इस कंसाइनमेंट को लूट लिया जाए तो वह सीधा दिल्ली को चैलेंज दे सकता है। उसने अपने सबसे खतरनाक लड़कों को भेजा और रात के अंधेरे में वह पूरा का पूरा कंसाइनमेंट चोरी करवा लिया। जैसे ही यह खबर ऊपर तक पहुंची पुलिस महकमे के हाथ पैर फूल गए। सीधा दिल्ली से इन्वेस्टिगेशन के ऑर्डर आए। जब पुलिस ने अपनी पूरी ताकत लगा दी तो वर्दा पकड़ा गया। उसे घसीटते हुए आजाद मैदान पुलिस स्टेशन लाया गया और लॉकअप में डाल दिया गया। यह खबर शहर में आग की तरह फैल गई। मस्तान को भी पता चला। मस्तान समझ गया कि यहीं वह पल है जिसका उसे बरसों से इंतजार था। दो दिन बाद हाजी मस्तान आजाद मैदान पुलिस स्टेशन पहुंचा। उसकी एंट्री किसी हॉलीवुड स्टार जैसी थी। उसने एकदम सफेद रंग का शानदार महंगा सूट पहना हुआ था। पैरों में चमचमाते सफेद जूते और हाथ में विदेशी ब्रांड की सिगरेट सुलग रही थी। पुलिस वाले मस्तान के रुतबे और उसके पैसे को जानते थे। कोई उसे रोकने की हिम्मत नहीं कर पाया। मस्तान ने सीनियर इंस्पेक्टर की आंखों में आंखें डालकर कहा, इसे थर्ड डिग्री मत देना। इसे छूना भी मत। मैं वह कंसाइनमेंट वर्दा से तुम्हें वापस दिलवा दूंगा। मुझे बस 10 मिनट इससे बात करने दो। इंस्पेक्टर बिना एक शब्द कहे चुपचाप पीछे हट गया। मस्तान लॉकअप की लोहे की सलाखों के पास गया। अंदर वर्दा जमीन पर बैठा था। यह बॉम्बे अंडरवर्ल्ड का सबसे आइकॉनिक और ऐतिहासिक विजुअल था। मस्तान ने सलाखों के अंदर झाका और बोला, वनक्कम मुदलियर। मैं मस्तान हूं। कंसाइनमेंट वापस कर दो। आज से मेरे साथ काम करो। वर्दा ने शक भरी नजरों से उसे देखा। उसे लगा ये अमीरजादा पुलिस का कोई दलाल है। मुझे सब में क्या मिलेगा? और तुम मेरे लिए ये पुलिस वालों से सेटिंग क्यों कर रहे हो? वर्दा मुझे तुम्हारी ताकत चाहिए। वर्दा कोई बेवकूफ नहीं था। वह समझ गया कि यह आदमी बहुत गहरी चाल चल रहा है। और उस वक्त वर्दा के पास पुलिस की मार और लंबी सजा से बचने का और कोई दूसरा रास्ता भी नहीं था। उसने सलाखों के बीच से हाथ बढ़ाया और मस्तान का हाथ थाम लिया। और इसी के साथ आजाद मैदान पुलिस स्टेशन के उस बदबूदार अंधेरे लॉकअप में बॉम्बे अंडरवर्ल्ड की सबसे खतरनाक, सबसे पावरफुल और सबसे लंबी चलने वाली पार्टनरशिप की नीव रखी गई। बॉम्बे के दो राजा अब एक हो चुके थे। वहीं दोस्तों अगर आप भी मेरे जैसे 2D एनिमेशन वीडियो बनाना सीखना चाहते हो वो भी एआई की मदद से तो मैंने आपके लिए एक कंप्लीट कोर्स बनाया है जिसमें मैंने स्टेप बाय स्टेप सिखाया है कैसे कोई वीडियो वायरल होता है। कैसे सही टॉपिक चुना जाता है। कैसे मेरे जैसे इंगेजिंग स्क्रिप्ट्स लिखी जाती हैं। कैसे एआई की मदद से 2D एनिमेशन विजुअल्स बनाए जाते हैं। कैसे एआई से वॉइस ओवर जनरेट करते हैं और कैसे एक क्लिक में वायरल थंबनेल्स तैयार किए जाते हैं। अभी इस कोर्स पर 50% का लिमिटेड ऑफर चल रहा है। यह ऑफर सिर्फ पहले 100 यूजर्स के लिए है तो देर मत कीजिए। डिस्क्रिप्शन में दिए गए लिंक पर क्लिक करें और आज ही ज्वाइन करें। हाजी मस्तान और वर्दा मुदलियर का एक साथ आना बिल्कुल वैसा ही था जैसे बारूद और माचिस का एक साथ आना। अब तक दोनों शहर के अलग-अलग हिस्सों में अपने-अपने धंधे कर रहे थे। लेकिन अब उन्होंने पूरे बॉम्बे को एक मैप की तरह आपस में बांट लिया था। साउथ बॉम्बे जहां अमीर लोग रहते थे जहां बड़े डॉकयार्ड थे जहां विदेशी बिजनेस होते थे। वह पूरा इलाका मस्तान ने अपने कंट्रोल में ले लिया। सेंट्रल बॉम्बे और सबर्ब्स जहां मिल वर्कर स्लम और आम जनता थी। वहां वर्दा का राज चलने लगा। दोनों एक दूसरे के काम में दखल नहीं देते थे। बल्कि एक दूसरे की रक्षा करते थे। अगर मस्तान के माल को कहीं ले जाना होता तो वर्दा के लड़के हथियारों के साथ एस्कॉर्ट करते। वर्दा अब सिर्फ एक माफिया डॉन नहीं एक मसीहा बन चुका था। उसने अपने घर पर बाकायदा जनता दरबार लगाना शुरू कर दिया था। साउथ इंडियन कम्युनिटी या बॉम्बे के किसी भी गरीब इंसान को कोई भी तकलीफ होती चाहे वह पुलिस का झूठ केस हो जमीन का कोई विवाद हो या घर का आपसी झगड़ा हो। लोग पुलिस स्टेशन या कोर्ट नहीं जाते थे। वह सीधा वर्दा के दरबार में हाजिरी लगाते थे। वर्दा फैसला सुनाता था और उसका फैसला पत्थर की लकीर होता था। अगर उसने किसी को सजा सुना दी तो बॉम्बे का कोई पुलिस वाला उसे बचा नहीं सकता था। हर साल माटुंगा स्टेशन के बाहर वह गणपति का सबसे बड़ा पंडाल लगाता था। इस पंडाल में पूरे शहर से लोग पुलिस वाले और नेता आते थे। वर्दा को बहुत अच्छे से पता था कि धर्म, आस्था और खौफ के कॉम्बिनेशन से आम जनता को कैसे कंट्रोल किया जाता है। उसका जलवा ऐसा था कि कई बार खुद हताश पुलिस अधिकारी वर्दा से रिक्वेस्ट करते थे कि वह शहर में छिपे हुए फरार मुजरिमों को सरेंडर करवा दे। और वर्दा के सिर्फ एक मैसेज पर खूंखार से खूंखार मुजरिम चुपचाप जाकर आजाद मैदान या डोंगरी पुलिस स्टेशन में सरेंडर कर देते थे। सिस्टम पूरी तरह से वर्दा के कंट्रोल में था। दूसरी तरफ हाजी मस्तान अपने बिजनेस को ग्लोबल लेवल पर ले जा रहा था। सोने की तस्करी तो चल ही रही थी लेकिन मस्तान ने एक नया लूप होल ढूंढा। भारत में विदेशी सोने की भारी डिमांड थी। लेकिन मिडिल ईस्ट और अफ्रीकन देशों में भारत की चांदी की बहुत ज्यादा डिमांड थी। मस्तान ने यहां से चांदी स्मगल करके अफ्रीका और दुबई भेजना शुरू कर दिया। यह धंधा इतनी तेजी से बढ़ा और इससे इतना प्रॉफिट हुआ कि अंडरवर्ल्ड और इंटरनेशनल मार्केट में उसकी चांदी का नाम मस्तान की चांदी पड़ गया। वह एक ब्रांड बन चुका था। मस्तान ने बॉम्बे के सबसे पॉश इलाके मालाबार हिल में एक आलीशान सी फेसिंग बंगला खरीदा। उसके पास विदेशी मर्सिडीज कारों का पूरा काफिला था। लेकिन उसकी सबसे फेवरेट कार थी एक इंपोर्टेड सफेद मर्सिडीज बेंज 200। मस्तान को बॉलीवुड की ग्रैंड पार्टियों में बड़े-बड़े नेताओं के साथ प्राइवेट मीटिंग्स में और मैगजींस के पेज पर देखा जाने लगा था। दिलीप कुमार से लेकर राज कपूर तक कई बढे फिल्मी सितारों के साथ मस्तान की तस्वीरें अखबारों में खुलेआम छपती थी। वह फिल्मों में पैसा लगा रहा था। करीब दो दशकों तक मस्तान और वर्धा ने बॉम्बे पर एक ऐसी मजबूत हुकूमत चलाई जिसे ना कोई ईमानदार पुलिस वाला तोड़ पाया। ना कोई चालाक नेता। साल 1975 प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश भर में इमरजेंसी लागू कर दी। रातों-रात 21 महीनों के लिए देश के कॉन्स्टिट्यूशन और आम नागरिकों के अधिकारों को सस्पेंड कर दिया गया। सरकार ने तय किया कि सिस्टम को साफ करना है और अपने विरोधियों को कुचलना है। इसी क्लीनअप ऑपरेशन और मीसा एक्ट के तहत जो सबसे बड़े नाम सरकार के रडार पर आए। उनमें से एक था हाजी मस्तान। मस्तान को रातों रात उसके आलीशान बंगले से गिरफ्तार कर लिया गया और यरवड़ा जेल में डाल दिया गया। मस्तान के लिए यह एक बड़ा झटका था। उसका सारा पैसा, सारे नेता दोस्त सब गायब हो गए। लेकिन जेल की वह काल कोठरी मस्तान के लिए अंत नहीं बल्कि एक नए ट्रांसफॉर्मेशन का सेंटर बन गया। उसी जेल में मस्तान की मुलाकात लोकनायक कहे जाने वाले जयप्रकाश नारायण से हुई। जेपी नारायण उस वक्त इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ सबसे बड़ी और सबसे इज्जतदार आवाज थे। जेल के अंदर मस्तान और जेपी नारायण के बीच कई लंबी बातचीत हुई। जेपी की फिलोसोफी, उनकी थिंकिंग और उनके समाज सुधार के नजरिए ने मस्तान के दिमाग पर बहुत गहरा असर डाला। जेपी ने उसे जुर्म की इस काली दुनिया को छोड़कर एक नेक और आम इंसान की तरह जिंदगी जीने की सलाह दी। जेपी की उन बातों ने मस्तान के दिल और दिमाग को अंदर तक हिला दिया। जब 18 महीने बाद मस्तान जेल से बाहर आया तो वह पूरी तरह से एक बदला हुआ इंसान था। उसने हमेशा हमेशा के लिए स्मगलिंग और क्राइम की दुनिया से तौबा कर ली। तस्करी को अलविदा कहने के बाद मस्तान ने अपनी जिंदगी का आखिरी दाव राजनीति के मैदान में चला। उसे लगा कि जो रुतबा उसने अंडरवर्ल्ड में कमाया है वही रुतबा उसे राजनीति में भी मिलेगा। उसने जोगेंद्र कवाड़े के साथ मिलकर दलित मुस्लिम सुरक्षा महासंघ नाम की एक पॉलिटिकल पार्टी बनाई। वह अल्पसंख्यकों और दलितों का मसीहा बनकर संसद तक पहुंचना चाहता था। 1984 में उसने चुनाव भी लड़ा। उसने इस चुनाव में पानी की तरह पैसा बहाया। यहां तक कि दिलीप कुमार जैसे बड़े स्टार्स ने भी उसके लिए रैलियां की। लेकिन जनता ने उसे सिरे से नकार दिया। वह चुनाव बुरी तरह हार गया। इसके बाद भी मस्तान का रुतबा मुंबई में पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था। वह अब एक विवाद सुलझाने वाले जज की भूमिका में आ चुका था। 80 के दशक के आखिर में जब मुंबई में पठानों और दाऊद इब्राहिम के गैंग के बीच खूनी खेल शुरू हुआ। तो मस्तान ने दोनों गैंग्स को अपने घर बुलाया और कुरान पर हाथ रखवा कर उनके बीच एक ऐतिहासिक समझौता करवाया। बॉम्बे पुलिस डिपार्टमेंट में एक नए बेहद तेज तर्रार निडर और खूंखार आईपीएस अधिकारी की एंट्री हुई। इस आईपीएस ऑफिसर का एक ही मिशन था। वरदराजन मुदलियर के इतने सालों के बनाए साम्राज्य को मिट्टी में मिलाना। लेकिन वर्दा के डीप पॉलिटिकल कनेक्शन और पैसे की ताकत की वजह से इस ऑफिसर का बार-बार ट्रांसफर कर दिया जाता था। लेकिन 1982 में पासा पलट चुका था। सरकार बदल चुकी थी और अब इस ऑफिसर को ऊपर से क्लीन चिट और फ्री हैंड मिल चुका था। इस आईपीएस ऑफिसर ने वर्दा के पूरे नेटवर्क को एक-एक करके तोड़ना शुरू किया। पुलिस की भारी फोर्स ने धारावी की अवैध शराब की उन सैकड़ों भट्टियों को बुलडोजर से रौंद कर रख दिया। वर्दा के सबसे वफादार और खतरनाक गुंडों को चुन-चुनकर एनकाउंटर में सड़कों पर मार गिराया गया या उन्हें बिना बेल के लंबे समय के लिए जेल की सलाखों के पीछे सड़ा दिया गया। पुलिस ने धारावी में घुसकर वर्दा का जनता दरबार हमेशा के लिए बंद करवा दिया। जो लोग कल तक वर्दा के सामने सिर झुकाते थे। वह अब पुलिस के डर से उसके खिलाफ गवाही देने लगे थे। वर्दा जो कभी बॉम्बे के आधे हिस्से को अपने उंगलियों के इशारों पर नचाता था। जो पुलिस कमिश्नर को अपनी जेब में रखता था। अब खुद अपने ही बनाए शहर में चूहों की तरह छिपने को मजबूर हो गया था। जब उसके सारे अभेद्य किले ढह गए। उसके सारे वफादार मारे गए तो 1982 के अंत में वरदराजन मुदलियर अपनी जान बचाकर रात के अंधेरे में हमेशा के लिए बॉम्बे छोड़कर अपने होमटाउन चेन्नई भाग गया। वर्दा के भागते ही और मस्तान के राजनीति में जाते ही बॉम्बे में एक बहुत बड़ा और खतरनाक चेंज आया। दाऊद इब्राहिम जो कभी मस्तान के लिए काम करता था। उसे मस्तान ने एक बहुत जरूरी नसीहत दी थी। अपना इलीगल काम रात 9:00 से सुबह 5:00 के बीच किया करो ताकि आम जनता और सिस्टम को तकलीफ ना हो। मस्तान हमेशा इसी उसूल पर चला था लेकिन दाऊद इब्राहिम की नस्ल अलग थी। उसने मस्तान की उन सभी हदों को पार कर दिया जो मस्तान ने कभी तय की थी। दाऊद ने ड्रग्स, आतंकवाद और हथियारों की उस खतरनाक दुनिया में कदम रखा जिससे मस्तान को हमेशा सख्त नफरत थी। जैसे-जैसे दाऊद का आतंक बढ़ता गया। हाजी मस्तान का युग धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में धुंधला पड़ने लगा। वह वक्त अब मस्तान का नहीं रहा था। अंडरवर्ल्ड अब उसूलों पर नहीं। बल्कि खून की प्यास पर चल रहा था। इन नए लड़कों के अंदर कोई उसूल नहीं था। अब स्मगलिंग की जगह एक्सटॉर्शन। सड़कों पर सुपारी किलिंग। बिल्डर्स को धमकाना और ड्रग्स के काले धंधे ने ले ली थी। हाजी मस्तान और वरदराजन मुदलियर का बनाया हुआ वह क्लासिक पुराना अंडरवर्ल्ड हमेशा के लिए खत्म हो चुका था। मस्तान ने अपनी पूरी क्रिमिनल लाइफ में बेहिसाब पैसा कमाया। अंडरवर्ल्ड पर राज किया। लेकिन वो कभी किसी भी अदालत में दोषी साबित नहीं हो सका। उस पर पुलिस कभी कोई मर्डर या स्मगलिंग का बड़ा केस साबित नहीं कर सकी। सिवाय इंदिरा गांधी की इमरजेंसी के। वो अपनी पूरी जिंदगी में कभी जेल नहीं गया। वो सिस्टम से हमेशा एक कदम आगे रहा। साल 1988 चेन्नई की गुमनामी में एक साधारण सी जिंदगी जीते हुए डिप्रेशन और अपने टूटे हुए साम्राज्य के दुख में वरदराजन मुदलियर की अचानक एक भयंकर हार्ट अटैक से मौत हो गई। और इस घटना के ठीक 6 साल बाद 1994 में बॉम्बे में अपने घर पर हाजी मस्तान को भी हार्ट अटैक ने अपनी चपेट में ले लिया। हाजी मस्तान और वरदराजन मुदलियर ये सिर्फ पुलिस फाइल्स में दर्ज दो नाम नहीं थे। यह बॉम्बे अंडरवर्ल्ड के वह असली आर्किटेक्ट थे जिन्होंने अपराध को सड़कों की लड़ाई से उठाकर एक मल्टी करोड़ इंडस्ट्री में बदल दिया। उनके जाने के बाद बॉम्बे बहुत तेजी से बदला। अंडरवर्ल्ड के चेहरे और तरीके बदले। दाऊद इब्राहिम और अरुण गवनी जैसे नए डॉन आए जिन्होंने शहर को गोलियों से छलनी कर दिया। दोस्तों आप इस पूरी डॉक्यूमेंट्री और इन दोनों किरदारों के बारे में क्या सोचते हैं? हमें अपनी राय नीचे कमेंट सेक्शन में जरूर बताइएगा। अगर कहानी पसंद आई हो तो इसे लाइक करें और चैनल को सब्सक्राइब करें। तब तक के लिए जय हिंद, जय भारत।



