[0:00]हेलो एवरीवन, मैं हूं आपका दोस्त निशांत और ज्ञान सफारी में आपका स्वागत है। मुंशी प्रेमचंद जी जो कि उर्दू और हिंदी के भारतीय लेखकों में से एक थे। जिन्होंने उपन्यास के क्षेत्र में अपना योगदान देते हुए अनेकों यथार्थवादी उपन्यास लिखें। उन्हीं उपन्यासों में से गवन एक बहुत चर्चित और प्रसिद्ध उपन्यास है। जिसको समराइज करके मैं आपके सामने लाया हूं और मैं चाहता हूं कि आप इस पुस्तक को पढ़े भी। जिससे कि आप उनके द्वारा इतने साल पहले लिखी इस पुस्तक से समझ सकें कि आज के समय पर भी इस पुस्तक की कहानी कितनी जीवंत लगती है। धन्यवाद। गवन लेखक प्रेमचंद, पब्लिश्ड बाय मैप्ले प्रेस प्राइवेट लिमिटेड।
[1:00]यह कहानी है रमानाथ की। उसके परिवार में उसके पिता, माता और उसके दो छोटे भाई हैं। पिता दयानाथ सरकारी नौकर हैं, तनख्वाह कम है लेकिन ऊपरी कमाई अच्छी खासी है। लेकिन मजाल है कि कभी किसी से पांच पैसे भी रिश्वत के लिए हो। घर की आम सुविधाएं जैसे खाना, कपड़ा तो आराम से चल जाता था। परंतु इसके अलावा कुछ भी करने के लिए या खरीदने के लिए बहुत सोचना पड़ता था। दयानाथ अपने बड़े बेटे रमानाथ के कारण हमेशा परेशान रहता था। क्योंकि वह कोई काम तो करता नहीं था और ना ही घर टिकता था। हर वक्त बस अपने दोस्तों के साथ मौज मस्ती ही करता रहता था। ईमानदारी के कारण पिता का अच्छा खासा नाम भी हो गया था। जिस कारण वहीं पास के एक महाशय दीनदयाल ने अपनी बेटी जालपा के विवाह का प्रस्ताव उनके बड़े बेटे रमानाथ के लिए भेजा। जालपा के पिता की नौकरी में तनख्वाह कम थी लेकिन ऊपरी कमाई से उन्होंने बहुत कुछ कमा लिया था। जिस कारण बेटी को खूब लाड़ प्यार से पाला गया। जालपा को गहनों से बहुत लगाव था और उसे हमेशा से लगता था कि उसकी शादी में ससुराल से चंद्रहार जरूर आएगा। रमानाथ के पिता शुरुआत में इस शादी को बहुत ही शांति और कम खर्च में करना चाहते थे। परंतु उनकी पत्नी ने उनके सामने जीत पकड़ ली कि कुछ तो खर्च करना ही होगा। थोड़ा कर्ज ले लेते हैं और लड़की वालों से जो भी मिलेगा वह कर्ज में चुका देंगे। जब शादी की तैयारियां शुरू हुईं तो दयानाथ ने भी बिना कर्ज और पैसे की चिंता किए हर काम टिप टॉप करने लगे। आतिशबाजी बढ़िया दर्जे की, गहने बढ़िया दर्जे के, ढोल धमाका बढ़िया दर्जे का। बारात बहुत धूमधाम से पहुंची तो लड़की बालों का भी सर ऊंचा हो गया। लेकिन जालपा दुखी थी। क्यों क्योंकि उसके बचपन की ख्वाहिश उसका चंद्रहार उन गहनों में कहीं नहीं था। जालपा अपने ससुराल तो आ गई लेकिन उसने सभी से बोलना चालना बंद कर दिया था। दूसरी तरफ जो दयानाथ ने उधार लिया था, वे लोग रोजाना घर पर तगादे के लिए आने लगे। जिसकी वजह से दयानाथ अपनी की गई गलतियों पर पछताने लगा। इस समस्या को हल करने के लिए दयानाथ ने अपने बेटे रमानाथ से बहू के कुछ गहने मांगने को कहा।
[3:59]जिसे देकर वह कुछ दिनों के लिए तगादे वालों को चुप करा सकता था। रमानाथ कहने कैसे मानता? वह तो इतना बढ़ा चढ़ाकर जालपा के सामने अपने अमीर होने की डींगे जो मार चुका था। रमानाथ ने इस परेशानी को हल करने का एक तरीका निकाला और एक रात जालपा के सो जाने पर सारे गहने चुराकर अपने पिता को दे दिए। और घर में यह फैला दिया कि चोर चोरी करके ले गया। दयानाथ को यह एक पाप जैसा लग रहा था। जिसने कभी एक पैसा भी दूसरों से नहीं लिया हो वह आज अपनी ही बहू के गहने रखे हुए था। लेकिन वह करता भी क्या? ना तो वापस दे सकता था और ना ही पुलिस को बुला सकता था। उस रात के बाद से जालपा की मनोस्थिति और भी खराब हो गई और वह अब बस अपने कमरे में ही पूरा दिन काट देती थी। ना कहीं जाना, ना किसी से बोलना-चालना। रमानाथ ने फिर ठान लिया कि अब उसे नौकरी करनी ही होगी। और अपने मित्र की मदद से उसे एक अच्छी नौकरी भी मिल गई। नौकरी ऐसी मिली थी कि शहर का शायद ही कोई व्यापारी रमानाथ को जानता ना हो। उसी कारण एक दिन बाजार में घूमने निकले तो एक सज्जन सुनार ने अपनी दुकान पर बुला लिया।
[5:37]और नए-नए गहनों को दिखाने लगा। रमानाथ के काफी मना करने और रुपए ना होने की बात बताने के बावजूद उसने एक ना सुनी और बस कहता रहा कि आप ले जाओ रुपए कौन सा कहीं भागे जा रहे हैं। एक-एक करके जब देखना शुरू किया तो ₹650 का सोना ले डाला। उसे इस कर्ज की रत्ती भर भी चिंता नहीं थी। उसे तो बस जालपा का चेहरा नजर आ रहा था। जब जालपा ने इनको देखा तो लगा जैसे किसी बच्चे को उसका खोया हुआ खिलौना मिल गया हो। जालपा के चेहरे की चमक और मुस्कान ने रमानाथ के हृदय को भी सुकून पहुंचा दिया। अब तो जालपा घर पर रुकती ही ना थी। किसी के यहां से बुलावा आए तो सबसे पहले सज धज कर अच्छे से बनठन कर जाने लगी। जल्दी ही उसकी बहुत सारी मित्र भी बन गई और इन्हीं में थी उनकी सबसे खास मित्र रतन। जालपा के रोजाना बाहर आने-जाने के कारण रमानाथ का अधिकतर पैसा खर्च होने लगा। वह इतना बचा ही नहीं पाता था कि कर्ज भी चुका सके। जब गहनों की बात बाजार में और सुनारों को पता लगी तो एक सुनार तो सब कुछ लेकर रमानाथ के घर ही पहुंच गया। और रमानाथ के एक बार फिर जालपा की खुशी के कारण 700 के गहने कर्ज पर ले डाले। अभी पिछला निपटा नहीं कि दूसरा और ले डाला। जालपा की परम मित्र ने जालपा और रमानाथ को एक बार खाने पर बुलाया। बातों ही बातों में उन्होंने जालपा के कंगन की तारीफ करते हुए कहा कि मेरे लिए भी ऐसे ही कंगन बनवा दें। रमानाथ ने हामी भरते हुए बनवाने का आश्वासन दे दिया। लेकिन रमानाथ सुनार के पास जाता भी तो किस मुंह से अभी पिछला उधार जो नहीं चुकाया था। कुछ समय बाद ही रतन ने रमानाथ को ₹600 भी दे दिए कि आप सुनार को यह देकर कंगन बनवा दीजिएगा। और रमानाथ को यहीं पर एक तरकीब सूझी कि यह रुपए वह पुराने वाले हिसाब में कटवाकर नए कंगन बनाने का ऑर्डर दे देगा। सुनार ने इन रुपयों को तो रख लिया और नए कंगन के लिए टालता रहा। रुपया ही एक साल बाद आया है फिर पता नहीं कब मिले।
[8:18]रतन कंगन के लिए रोजाना पूछने लगी। लेकिन रमानाथ भी बस टालता ही रहा वह कर भी क्या सकता था। एक दिन रतन ने गुस्से में कह दिया या तो आज शाम तक मेरे रस या कंगन दे।
[8:37]रमानाथ को तो अब कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि करे तो करे क्या। जहां से भी रुपए मांग सकता था वहां कोशिश सफल ना हुई। वह अपने ऑफिस तो गया लेकिन दिमाग में बस वही गुत्थम गुत्थी चल रही थी कि आखिर पैसे कहां से लाए। उस दिन अपने ऑफिस में आए ₹800 एक पैकेट में बांधे और अपने अधिकारी को देने के बजाय अपने घर ले गया। उसे लगा जब रतन आएगी तो दे देगा।
[9:14]शायद वह रुपए देखकर समझ जाएगी कि हां सुनार ही कुछ गड़बड़ कर रहा है। उस पैकेट को जालपा को देते हुए उसने अलमारी में रखवा दिया। कुछ देर बाद जब रतन आई तो जालपा ने भी गुस्से में ₹600 के बजाय ₹800 वाला पूरा पैकेट रतन को लौटा दिया। बहुत मना भी किया कि नहीं रख लो लेकिन कंगन बनवा देना लेकिन जालपा ने यह कहकर लौटा दिए कि जब कंगन बनकर आ जाएंगे तो रुपए ले लिए जाएंगे। उनके जाते ही रमानाथ टहल कर लौटा और यह सब सुनकर उसे धक्का लग गया। अब तो वह और बड़ी मुसीबत में फंस गया। आखिर सरकारी रुपया जो खर्च कर दिया था। अब तो उसे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। आखिर ऑफिस में जाकर जब अधिकारी हिसाब मांगेंगे तो क्या जवाब देगा। इसी कश्मकश में अगले दिन ऑफिस जाकर अपने मित्र को बताया कि वह रुपए कहीं गिर गए हैं। यह सुनकर वह भी बौखला गया और साफ कह दिया कि अगर कल तक रुपए नहीं लाए तो मुझे पुलिस को बुलाना पड़ेगा। सरकारी काम में किसी तरह की कोई रियायत नहीं करेगा। जब हर तरफ से उसे लगने लगा कि अब बचने का कोई चारा नहीं। तो रमानाथ ने एक चिट्ठी में सारा सच लिख डाला।
[10:52]घर में चोरी गहनों से लेकर ऑफिस के रुपए तक का। और जालपा को देने का ठान लिया। लेकिन जब घर पहुंचा तो जालपा को वह पत्र देने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाया। लेकिन किसी तरीके से वह खत जालपा को मिल गया। रमानाथ शर्म के मारे उसी समय घर से निकल गया। जालपा उस खत को पढ़-पढ़कर अपने आप को कोसने लगी कि उसके गहनों के प्रति लगाव ने सब बर्बाद कर दिया। जब तक जालपा खुद को संभालती और रमानाथ को रोकने का प्रयास कर पाती तब तक तो रमानाथ ट्रेन में सवार होकर प्रयाग जाने के लिए बैठ चुका था। जहां एक तरफ सभी ढूंढने में लगे थे वहीं दूसरी तरफ रमानाथ कभी घर वापस ना आने की ठान रहा था। जालपा को लगा शायद पुलिस के कारण कहीं छुप गए हो इसलिए उसने सबसे पहले अपने गहनों को बेचकर मिले रुपयों को रमानाथ के ऑफिस में जमा करा दिया। सब लोगों ने बहुत ढूंढने का प्रयास किया लेकिन मिल कैसे पाते रमानाथ तो अब प्रयाग जा पहुंचे थे।
[12:08]ट्रेन में ही रमानाथ की मुलाकात एक बुजुर्ग व्यक्ति देवीदीन से हुई। जिन्होंने रमानाथ की सारी परेशानी को सुना और अपने घर पर ही रहने का प्रस्ताव दिया। रमानाथ आखिर जाता भी तो कहां उसके पास इस प्रस्ताव के मानने के अलावा कोई और दूसरा चारा भी तो नहीं था। अब रमानाथ देवीदीन के घर पर ही रहने लगा। उसके घर पर देवीदीन की पत्नी जग्गो भी रहती थी जो कि घर के बाहर ही एक छोटी सी सब्जी की दुकान चलाती थी। बहुत महीनों तक तो रमानाथ घर से बाहर ही नहीं निकला। उसे डर था कि कहीं पुलिस उसे पकड़ ना ले। रमानाथ देवीदीन को अब पिता और जग्गो को अपनी मां की तरह मानता था। और वह दोनों भी बेटे की तरह ही लाड़ प्यार करते थे। एक दिन अखबार में शतरंज की ऐसी चाल छपी कि उसको हल करने वाले को ₹50 इनाम भी दिया जाएगा। उस चाल को सुलझाने की बहुत से लोगों ने कोशिश की लेकिन नहीं सुलझा पाए। किसी तरह रमानाथ को वह अखबार मिल गया और कुछ ही समय में उसे सुलझा भी दिया। उसे पुरस्कार के ₹50 भी मिले। इस पुरस्कार के मिलने पर जग्गो ने उसे समझाया कि रमानाथ रात के समय पर चाय की दुकान क्यों नहीं खोल लेता। रमानाथ को यह सुझाव बहुत अच्छा लगा और उसने दुकान खुलने में जरूरत की सारी चीजों को इकट्ठा कर लिया। हल्के-हल्के दुकान की बिक्री बढ़ती गई और रमानाथ की मानसिक स्थिति में भी अब सुधार होने लगा। दिन में खाना बनाता, सोता और रात में दुकान चलाता। रमानाथ के हाथ पैसा आते ही वह छुप-छुप कर घूमने भी जाने लगा। कोई पहचान ना ले इसलिए भेष बदलकर अंधेरे में ही निकलता था। एक दिन मनोरमा थिएटर में राधेश्याम का नया नाटक होने वाला था जिसे देखने की उसे बहुत इच्छा हुई। लेकिन सीटें सीमित होने की वजह से अपनी सीट आरक्षित कराने के लिए वह रात में टिकट लेने के लिए निकला। डर तो लग रहा था लेकिन हिम्मत बांधकर वह निकल गया। कुछ दूर चलने के बाद ही दो पुलिस वाले दिखे। उन्हें देखने के कारण वह सड़क का रास्ता छोड़कर पटरी के रास्ते चलने लगा। पुलिस वालों को शक होने लगा तो उन्होंने पकड़कर पूछताछ की। तो रमानाथ ने घबराहट में सब गलत बता दिया। जब देवीदीन भी वहां पहुंचा तो उसने नाम और पता सच बोला। लेकिन पुलिस वालों ने सोचा कि आखिर इसने पूछने पर झूठ बोला ही क्यों। रमानाथ को दरोगा जी के सामने पेश किया गया। उस समय एक बहुत बड़ी डकैती वाले केस की वजह से दरोगा बहुत ही परेशान था। दरोगा ने जब रमानाथ को डांटकर पूछा तो रमानाथ ने अपना पूरा कच्चा चिट्ठा खोल दिया। दरोगा जी ने उसकी बात को पक्का करने के लिए उसके ऑफिस में फोन कर डाला। और पूछताछ की कि क्या रमानाथ नाम का कोई व्यक्ति वहां काम करता था और क्या वह कोई सरकारी पैसा लेकर भागा है। उधर से फोन रमानाथ के मित्र ने उठाया था। उसने सरकारी पैसे वाली बात को तो नकार दिया लेकिन दरोगा जी से पूछने लगा कि क्या रमानाथ वहां पर है।
[15:48]लेकिन इतने में ही दरोगा जी ने फोन काट दिया। दरोगा को यह सुनहरा अवसर लगा कि इसे डकैती वाले केस में झूठी गवाही दिलवा कर डकैती वाले केस को सॉल्व कर लेंगे। दरोगा ने इसके बदले में अच्छी नौकरी, अच्छी जिंदगी जीने का लालच और पुराने वाले केस को बंद करवाने का आश्वासन दिया जो कि कभी लिखा ही नहीं गया। रमानाथ का मित्र जब घर पर इस खबर को लेकर पहुंचा तो पता चला कि जालपा को तो पहले ही पता लग गया है कि रमानाथ प्रयाग में है। जब उससे पूछा गया कि तुम्हें कैसे पता लगा तो उसने बताया कि मैंने अखबार में शतरंज की एक चाल छपवाई थी। मैंने सोचा था कि शायद तीन निशाने लग जाएं और वैसा ही हुआ। अब जालपा रमानाथ को वापस लाने के लिए प्रयाग जाने की तैयारी कर रही थी। लेकिन उसे क्या पता था कि प्रयाग में तो पुलिस किसी और ही प्लानिंग में है। रमानाथ दरोगा की बातों में आकर झूठी गवाही देने को तैयार हो गया। उसे बताया गया कि लोग इनके डर के मारे गवाही नहीं देते। इन लोगों ने बहुत से लोगों के घर उजाड़ दिए और ना जाने क्या-क्या। देवीदीन और जग्गो दोनों ही गुस्सा थे कि रमानाथ उन बेगुनाहों के साथ ऐसा कैसे कर सकता है। कुछ ही दिनों बाद जब जालपा भी देवीदीन के घर पहुंच गई तब उसे सब बताया गया। तो उसे यकीन ही नहीं हुआ कि रमानाथ इतना स्वार्थी कैसे हो सकता है। जब जालपा ने ठान लिया कि वह उसे ऐसा नहीं करने देगी। जालपा ने रमानाथ से किसी भी तरह मिलने की ठान ली। लेकिन पुलिस के कड़े पहरे के कारण वह मिल नहीं पाई। बहुत कोशिशों के बाद जालपा ने अपना खत तो उस तक पहुंचा दिया जिसे पढ़कर रमानाथ बहुत बेचैन हुआ। उसे तो यकीन ही नहीं हुआ कि जालपा यहां आखिर आ कैसे गई। वह किसी भी हालत में अब उससे मिलना चाहता था। लेकिन पुलिस के पहरे को आखिर चकमा कैसे दे। उसी रात लाइट जाने के कारण उसे एक ऐसा मौका मिला जिसको उसने गवाना उचित ना समझा। और वह पीछे के रास्ते से निकलकर देवीदीन के घर जा पहुंचा। जब जालपा से उसकी मुलाकात हुई तो जालपा ने उसे सब सच बताया। तो वह बहुत दुखी हो गया। और उसे दरोगा पर इतना गुस्सा आने लगा कि मानो अभी वह उसका कत्ल भी कर दे। कुछ समय बाद रमानाथ वापस अपने कमरे में आ गया। लेकिन अगले ही दिन रमानाथ दरोगा पर बहुत गुस्सा हुआ। पर दरोगा ने उसे दूसरे केस में फंसाने का डर दिखाकर चुप करा दिया। रमानाथ को इतना डरा दिया गया कि वह अब गवाही पलटने का सोच भी नहीं सकता था। गवाही चलने लगी। महीनों तक पेशी हुई और इतने दिनों में रमानाथ ने जालपा से मिलने का सोचा भी नहीं। उसे लगा कि बेहतर है वह अब उससे ना मिले। क्योंकि क्या पता कि पुलिस वाले जालपा का जीना भी दुश्वार कर दें। इसी दौरान दरोगा ने जालपा को रमानाथ से दूर करने के लिए एक वैश्या जोहरा की मदद ली। रमानाथ भी अब उसके मुंह में आ गया मगर वह जालपा को भूल नहीं पाया। एक दिन रमानाथ ने जोहरा से जालपा की स्थिति पता करने के लिए कहा और वह जब जालपा की खबर लेकर आई कि वह उन लोगों के यहां काम कर रही है जिनके खिलाफ तुम गवाही दे रहे हो। वह तुम्हारे कर्मों का प्रायश्चित कर रही है। इन सब बातों को सुनकर कुछ ऐसा हुआ जिसकी शायद किसी ने उम्मीद ही नहीं की थी। गवाही का आखिरी दिन था। आज सजा सुनाई जानी थी। रमानाथ कटघरे में आया और सब लोगों की सांसे थम गई। और फिर रमानाथ ने बोलना शुरू किया तो बिना डरे जज के सामने सब सच बता दिया। उसकी गवाही देने की मजबूरी को समझते हुए रमानाथ को झूठी गवाही के लिए बिना सजा दिए ही छोड़ दिया गया और उन बेगुनाहों को बायज्जत बरी कर दिया गया। सभी लोग खुश थे। जालपा के तो मानो जैसे सर से कितना बड़ा बोझ उतर गया हो। रमानाथ और जालपा फिर देवीदीन के घर गए और बैठकर अपने कठिनाई भरे समय को याद किया। और देवीदीन और जग्गो को उनकी मदद और हर समय साथ खड़े रहने के लिए धन्यवाद दिया। अब जालपा और रमानाथ अपने घर वापस चल दिए और घर आने के बाद जालपा को अब गहनों का रत्ती भर भी मुंह नहीं रहा। वह जितना कमाते उसी में खुशी-खुशी अपने गृहस्थ जीवन को व्यतीत करने लगे। धन्यवाद। उम्मीद करता हूं आपको यह समरी पसंद आई होगी। अगर आप किसी भी प्रकार का कोई इंप्रूवमेंट चाहते हैं या किसी और बुक पर भी समरी चाहते हैं तो कृपया कमेंट सेक्शन में मुझे लिखकर जरूर बताएं।
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