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The Money Matrix : पैसा, पावर और System HIDDEN HISTORY.

DADA TuhiRam

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[0:06]दुनिया पे कर्ज है 340 ट्रिलियन डॉलर दुनिया की पूरी कमाई है 100 ट्रिलियन डॉलर। कर्ज है कमाई से 3 गुना ज्यादा। यह मैथमेटिकली इंपॉसिबल है, तो यह हुआ कैसे? और सबसे इंपॉर्टेंट यह जानबूझकर किया गया है। एक ऐसा सिस्टम जो 300 साल पहले डिजाइन किया गया था चार लोगों ने, चार बैंकर्स ने। 300 साल एक-एक करके एक ऐसा जाल बुना है जिसमें से कोई नहीं निकल सकता। ना तुम, ना मैं, ना हमारा देश, ना कोई भी देश। और आज मैं तुम्हें दिखाऊंगा कि यह जाल कैसे बुना गया, किसने बुना और क्यों दुनिया का हर देश आज कर्जे में डूबा हुआ है जिसमें से निकलना मैथमेटिकली इंपॉसिबल है। अब एक फैक्ट सुनो जो तुम्हारा दिमाग हिला देगा। दुनिया का हर देश कर्ज में है। हर एक। अमेरिका पर $38 ट्रिलियन का कर्ज है। जापान पर $9 ट्रिलियन का कर्ज है। चाइना पर $13 ट्रिलियन का कर्ज है। रशिया पर भी 450 बिलियन डॉलर का कर्ज है। इंडिया पे 170 लाख करोड़ से ज्यादा का कर्ज है। पूरी दुनिया पर कुल मिलाकर $340 ट्रिलियन का कर्ज है। यह दुनिया की पूरी अर्थव्यवस्था से 3 गुना ज्यादा है। अब यहां रुको और सोचो। अगर हर देश पे कर्ज है तो यह पैसा किसने दिया है? अगर सब पर उधारी है तो वह उधारी किससे ली है और किसने दी है? क्या एलियंस ने दी है? मंगल ग्रह से आया यह पैसा? यह सवाल सिंपल लगता है, लेकिन इसका जवाब सुनोगे तो बैठ जाओगे। यह पैसा किसी के पास से आया ही नहीं। यह हवा से बनाया गया है। हां, हवा से, कुछ नहीं से। पैसा बन गया। यह कैसे पॉसिबल है? यह समझने के लिए तुम्हें चार लोगों की कहानी सुननी पड़ेगी। चार बैंकर्स, 300 साल। एक-एक करके इन्होंने ऐसा जाल बुना कि आज पूरी दुनिया उसमें फंसी है। और यह कोई 300 साल की सीक्रेट प्लानिंग नहीं थी। सिस्टम स्टेप बाय स्टेप इवॉल्व हुआ। इंसेंटिव्स ने इसको शेप दिया और यह असली इतिहास है। कागज पे लिखा है। मीटिंग्स हुई, अग्रीमेंट्स हुए, कानून बने। सब ऑफिशियल रिकॉर्ड में है। पहले आदमी से शुरू करते हैं। साल 1694 से पहले की दुनिया समझो। उस वक्त देश ऐसे नहीं होते थे जैसे आज है। राजे होते थे। राजाओं को पैसों की जरूरत होती थी। जंग लड़नी है तो पैसा चाहिए। किला बनाना है तो पैसा चाहिए। फौज को तनख्वाह देनी है तो पैसा चाहिए। तो क्या करते थे राजे? किसी अमीर सेठ से उधारी लेते थे। प्रॉमिस करते थे कि वापस करूंगा इंटरेस्ट के साथ। और अगर वापस नहीं कर पाए तो क्या होता था? राजा कहता था कि भाई नहीं दे सकता, माफ कर। सेठ का पैसा डूब जाता था। कभी-कभी राजा सेठ को जेल भी करवा देता था ताकि मांगने ना आए। और फिर राजा किसी और सेठ से उधारी ले लेता था। सिस्टम साफ हो जाता था। कर्ज कुछ वक्त के लिए होता था या तो चुका दिया या तो मना कर दिया, लेकिन कर्ज हमेशा के लिए नहीं होता था। लेकिन एक आदमी ने यह पूरा सिस्टम बदल दिया। उसका नाम था विलियम पैटर्सन। यह एक स्कॉटिश सौदागर था, मतलब स्कॉटलैंड का व्यापारी। यह कई बार अमीर बनने की कोशिश करके फेल हो चुका था। आधी जिंदगी इधर-उधर भटकता रहा। साल 1691 में इसके दिमाग में एक आईडिया आया जो पूरी इंसानियत की तकदीर बदलने वाला था। उस वक्त इंग्लैंड फ्रांस के साथ जंग लड़ रहा था। इंग्लैंड का राजा था विलियम द थर्ड। वह डेसपरेटली पैसों की जरूरत में था। खजाना खाली था। क्यों? जंग सस्ती नहीं होती। सोचो जंग लड़ने के लिए क्या-क्या चाहिए? सोल्जर्स की तनख्वाह। एक सोल्जर को महीने के 2-3 पाउंड मिलते थे। 50,000 सोल्जर्स हो तो सोचो कितना पैसा चाहिए हर महीना। वेपन्स, बंदूकें, तलवारें, गोला बारूद यह सब फैक्ट्रीज से ऑर्डर करना पड़ता था। कैश में। शिप्स, नेवल वॉर के लिए वॉरशिप्स बनाने पड़ते थे। एक वॉरशिप बनने में 2-3 साल लगते थे और हजारों पाउंड्स खर्च होते थे। खाना और सप्लाइज। 50,000 सोल्जर्स को रोज खिलाना, घोड़े, गधे, ट्रांसपोर्ट, टेंट्स, यूनिफॉर्म्स यह सब रोज का खर्चा। और कभी-कभी मर्सनेरीज भी हायर करने पड़ते थे। विदेशी सोल्जर्स जो और भी महंगे होते थे टैक्स से। टैक्स से इतना पैसा नहीं आ रहा था। ट्रेजरी खाली थी। राजा पर्सनली गरीब नहीं था, उसके महल थे, सर्वेंट्स थे, लेकिन देश का खजाना खाली था और जंग हारे तो सब खत्म। और पुराने सेठ नया लोन देने से मना कर रहे थे। क्यों? क्योंकि इंग्लैंड पहले भी लोन लेकर मना कर चुका था। कह दिया था, नहीं दे सकते। सेठों का पैसा डूबा था। अब भरोसा नहीं था। तो पैटर्सन राजा के पास गया एक प्रपोजल लेकर। उसने कहा कि मैं अमीर सेठों का एक ग्रुप बनाऊंगा। हम मिलकर गवर्नमेंट को 12,00,000 पाउंड देंगे। अब यहां गवर्नमेंट का मतलब क्या है? उस वक्त राजा और उसकी पार्लियामेंट मिलके गवर्नमेंट होते थे। राजा अकेला डिसीजन नहीं ले सकता था। पार्लियामेंट की भी हां चाहिए होती थी। पार्लियामेंट मतलब अमीर लोगों की एक सभा जो राजा के साथ मिलकर देश चलाती थी। तो पैटर्सन ने प्रपोज किया, हम गवर्नमेंट को £12,00,000 देंगे। यह आज के हिसाब से लगभग $300 मिलियन होता है। 2000 करोड़ से ज्यादा। बहुत बड़ी रकम। अब यहां पैटर्सन की चाल समझो। उसने कहा कि यह लोन कभी वापस नहीं करना। कभी नहीं। असली रकम जो £12,00,000 है, वह कभी नहीं लौटाना। बस इंटरेस्ट देते रहना हमेशा के लिए। 8% इंटरेस्ट हर साल। सोचो इसका मतलब। तुमने ₹100 उधारी लिए। तुम्हें वह ₹100 कभी वापस नहीं करने। बस हर साल ₹8 देते रहो जिंदगी भर। तुम्हारे मरने के बाद तुम्हारे बेटे भी ₹8 दें। उसके मरने के बाद उसके बेटे भी। और यह सिलसिला कभी खत्म ना हो। तुम पूछोगे कि सेठ यह क्यों मानेंगे? पागल हैं क्या? अपना पैसा देंगे और वापस नहीं लेंगे? और उस इंटरेस्ट की भी क्या गारंटी? बहुत सही सवाल। और यहां पैटर्सन की असली शातिराई समझो। सेठ अपना पैसा डायरेक्ट राजा को नहीं देंगे। पहले एक नया इंस्टीट्यूशन बनेगा। उसका नाम होगा बैंक ऑफ इंग्लैंड। यह बैंक ऑफ इंग्लैंड दुनिया का पहला सेंट्रल बैंक था। सेंट्रल बैंक मतलब क्या? वह बैंक जो बाकी सब बैंक्स का बाप हो, जो सीधा सरकार को पैसा दे सके, जो पूरे देश के पैसों को कंट्रोल करे। सेठ अपना सोना इस बैंक ऑफ इंग्लैंड में डालेंगे। फिर यह बैंक वह सोना गिरवी रखकर गवर्नमेंट को लोन देगा। लेकिन रिस्क अगर राजा मना कर दे तो? इसीलिए पैटर्सन ने कहा कि यह इंटरेस्ट की गारंटी पार्लियामेंट देगी। मतलब राजा नहीं, पूरी पार्लियामेंट। और पार्लियामेंट गारंटी कैसे देगी? टैक्स से। मतलब जब तक इंग्लैंड की आवाम टैक्स भरती रहेगी तब तक इंटरेस्ट आता रहेगा। राजा मरे या जिए, सरकार बदले या ना बदले, जब तक देश है, लोग हैं, टैक्स है तब तक सेठों का इंटरेस्ट आता रहेगा। बिना कुछ किए सोते-सोते पैसा आता रहेगा। पार्लियामेंट ने यह स्कीम 1694 में अप्रूव कर दी। बैंक ऑफ इंग्लैंड बना। सेठों ने सोना दिया। गवर्नमेंट को जंग का पैसा मिल गया और इंसानी इतिहास में पहली बार देश का कर्ज परमानेंट हो गया हमेशा के लिए। यह कोई प्रॉब्लम नहीं थी जिसे सॉल्व करना है, यह सिस्टम का एक फीचर बन गई। लेकिन रुको, सबसे खतरनाक बात अभी आई नहीं। बैंक ऑफ इंग्लैंड को एक और पावर दी गई। वह गवर्नमेंट के कर्ज के अगेंस्ट नोट्स छाप सकता था। मतलब कागज का पैसा छाप सकता था। यह समझो ध्यान से। पहले सोना ही पैसा होता था। तुम्हारे पास सोना है तो तुम अमीर हो। नहीं है तो गरीब हो। लेकिन अब एक नया कॉन्सेप्ट आया पेपर मनी, कागज का पैसा। बैंक ऑफ इंग्लैंड ने कहा कि हम कागज के नोट्स छापेंगे और हर नोट पर लिखा होगा कि इस नोट के बदले में बैंक ऑफ इंग्लैंड से सोना मिल सकता है। अब गवर्नमेंट ने 12,00,000 पाउंड का लोन लिया। बैंक ने नोट छाप दिए। मतलब क्या हुआ? गवर्नमेंट ने कर्ज लिया। उस कर्ज के बदले में नए नोट छाप गए और यह नए नोट्स मार्केट में आ गए। गवर्नमेंट जितना ज्यादा कर्ज ले, बैंक उतने ज्यादा नोट छापे, उतना ज्यादा पैसा मार्केट में आए। अभी यह पूरा समझ में नहीं आया होगा। कोई बात नहीं। आगे मॉर्गन की कहानी में मैं तुम्हें स्टेप बाय स्टेप समझाऊंगा कि यह एग्जेक्टली कैसे काम करता है। अभी इतना समझो कि पैटर्सन ने एक टेंपलेट बनाया। स्टेप वन, गवर्नमेंट उधारी ले। स्टेप टू, उस उधारी के अगेंस्ट नए नोट छाप जाए। स्टेप थ्री, असली रकम कभी ना चुकाए। स्टेप फोर, इंटरेस्ट हमेशा भरे। स्टेप फाइव, यह चक्कर चलता रहे हमेशा के लिए। अगर तुम बैंकर हो तो यह कमाल का सिस्टम है। तुम सोते-सोते पैसा कमा रहे हो। लेकिन अगर तुम आम आदमी हो, टैक्सपेयर हो तो यह बर्बादी है क्योंकि तुम उस कर्ज का इंटरेस्ट भर रहे हो जो कभी खत्म होगा नहीं। पैटर्सन 1719 में मर गया। कोई खास अमीर नहीं बना। लेकिन जो सिस्टम उसने बनाया वह 331 साल बाद आज भी चालू है। ब्रिटिश गवर्नमेंट का कर्ज आज तक चुकाया नहीं गया। कभी नहीं। बस बढ़ता रहा। यह पहला जाल था। अब रुको और दूसरा आर्किटेक्ट समझो। पैटर्सन में कर्ज को परमानेंट बनाया, लेकिन उसकी एक लिमिट थी। एक देश का सेठ एक देश की गवर्नमेंट को पैसा देता था। सब कुछ एक देश के अंदर। और अगर उस देश की गवर्नमेंट ने ही मना कर दिया, अगर देश ही डिफॉल्ट कर दे तो सेठ का पैसा डूबता था। लेकिन बाकी दुनिया पे क्या असर? कुछ नहीं। इंग्लैंड का मसला इंग्लैंड में। फ्रांस को क्या फर्क पड़ता? जर्मनी को क्या? दूसरे आर्किटेक्ट ने इस लिमिट को तोड़ दिया। उसका नाम था नेथन रॉथचाइल्ड। पहले रॉथचाइल्ड फैमिली को समझो। यह पांच भाई थे। पांचों यूरोप के 5 मेन शहरों में बैंकिंग सेक्टर में टॉप पर थे। लंदन, पेरिस, फ्रैंकफर्ट, वियना, नेपल्स पांच बड़े शहर। हर शहर में एक रॉथचाइल्ड भाई। अब नेथन रॉथचाइल्ड की बात करते हैं जो लंदन में था। पांच भाइयों में सबसे शातिर। उस वक्त यूरोप में नेपोलियन नाम का एक फ्रेंच जनरल पूरी दुनिया पर कब्जा करने चला था। इंग्लैंड, ऑस्ट्रिया, प्रशा, रशिया सब उससे लड़ने के लिए पैसा चाहते थे। नेथन ने यहां एक नया धंधा शुरू किया। पहले समझो कर्ज का पुराना तरीका। गवर्नमेंट को पैसा चाहिए। वह किसी सेठ के पास जाती। सेठ अपने पैसों में से उधारी देता। गवर्नमेंट इंटरेस्ट देती। सिंपल। प्रॉब्लम क्या थी? सिर्फ बहुत अमीर सेठ ही गवर्नमेंट को पैसा दे सकते थे। छोटे इन्वेस्टर के लिए कोई रास्ता नहीं था। अब समझो नेथन ने क्या नया किया। मैं तुम्हें सब्जी मंडी के एग्जांपल से समझाता हूं। सोचो तुम्हारे गांव में एक सब्जी मंडी है। किसान सब्जी लाता है, सीधा कस्टमर को बेचता है। सिंपल। अब सोचो एक आदमी आया। उसने कहा मैं बीच में बैठूंगा। किसान मुझे सब्जी बेचेगा, मैं कस्टमर्स को बेचूंगा। बीच का मुनाफा मेरा। यही नेथन ने किया, लेकिन सब्जी की जगह कर्ज के साथ। गवर्नमेंट को पैसा चाहिए। वह एक कागज लिखती थी जिसमें लिखा होता हमने ₹1000 पाउंड का कर्ज लिया है। हम इस कागज के मालिक को हर साल £50 इंटरेस्ट देंगे और 10 साल बाद ₹1000 पाउंड वापस। इस कागज को बॉन्ड कहते हैं। बॉन्ड एक तरह का वादा है। गवर्नमेंट का वादा कि वह पैसा वापस करेगी इंटरेस्ट के साथ। और यह वादा एक कागज पर लिखा है जो हाथ से हाथ बिक सकता है। पहले गवर्नमेंट यह बॉन्ड सीधा सेठों को बेचती थी, लेकिन सिर्फ अमीर सेठ खरीद सकते थे क्योंकि एक-एक बॉन्ड बहुत महंगा होता था। नेथन ने कहा तुम यह बॉन्ड मुझे दो। मैं इसे छोटे-छोटे पीस में बांट दूंगा 100-100 पाउंड के 100 पीस में बांट दूंगा। अब क्या हुआ? पहले सिर्फ 20 अमीर लोग खरीद सकते थे। अब 2000 लोग खरीद सकते हैं। डॉक्टर खरीद सकता है, वकील खरीद सकता है, दुकानदार खरीद सकता है। जिसके पास थोड़ा भी पैसा बचा है वह खरीद सकता है। जब ज्यादा लोग खरीदना चाहें तो जल्दी बिकता है। हफ्ते भर में पैसा मिल जाता है।

[12:20]और रॉथचाइल्ड? वह बीच में कमीशन खाता था। हर बॉन्ड पे थोड़ा एक्स्ट्रा चार्ज करके बेचता था। 100 का बॉन्ड $102, $103 में बेचता। दो-तीन पाउंड की कमाई हर बॉन्ड पे। गवर्नमेंट को फायदा। पैसा जल्दी मिला, इजीली मिला। रॉथचाइल्ड को फायदा। कमीशन मिला, धंधा बड़ा हुआ। इन्वेस्टर्स को फायदा। छोटा पैसा लगाकर गवर्नमेंट का इंटरेस्ट कमा सकते थे। अब यहां एक और नया कांसेप्ट आया सेकेंडरी मार्केट। मतलब एक ऐसी जगह जहां बॉन्ड्स बिक सके खरीददार से खरीददार तक। सोचो तुम एक बॉन्ड खरीदे। अब तुम्हें पैसा चाहिए अर्जेंट। पहले क्या करते? गवर्नमेंट के पास जाते, मेरा पैसा वापस दो। गवर्नमेंट बोलती, भाई 10 साल बाद मिलेगा इंतजार करो। लेकिन अब तुम वो बॉन्ड किसी और को बेच सकते हो। कल खरीदा, आज बेचा, पैसा मिल गया। नेथन रॉथचाइल्ड ने यह पूरा सिस्टम ऑर्गेनाइज किया। हर देश के बॉन्ड्स, हर जगह बायर्स। एक नेटवर्क जहां कर्ज बिकता था सब्जी की तरह। अब समझो ये खतरनाक क्यों था। रॉथचाइल्ड से पहले अगर कोई गवर्नमेंट कहती थी कि नहीं दूंगा पैसा तो क्या होता था? एक सेठ का पैसा डूबता था। वो सेठ दुखी होता था। बाकी दुनिया पे कोई असर नहीं। लेकिन रॉथचाइल्ड के बाद अब ब्रिटिश गवर्नमेंट के बॉन्ड्स फ्रेंच इन्वेस्टर्स के पास थे। फ्रेंच बॉन्ड्स जर्मन बैंक्स के पास थे। जर्मन बॉन्ड्स ऑस्ट्रियन प्रिंसेस के पास थे। सब एक दूसरे से जुड़ गए। अगर अब ब्रिटिश गवर्नमेंट कहती हम पैसा नहीं देंगे तो क्या होता?

[14:52]इंग्लैंड के बॉन्ड्स की वैल्यू जीरो, कागज बेकार। फ्रांस वालों का कैसा डूबता? वो बैंक्रप्ट होने लगते। बैंक्रप्ट होने से बचने के लिए वो अपने जर्मनी वाले बॉन्ड्स बेचने लगते जल्दी-जल्दी कम दाम में। जर्मन बॉन्ड्स की वैल्यू गिरती। जर्मन बैंक्स डूबने लगते। वह ऑस्ट्रियन वाले बॉन्ड्स बेचने लगते। ऑस्ट्रिया डूबता फिर और देश। एक के गिरने से दूसरा गिरता, दूसरे से तीसरा। डोमिनो की तरह सब गिर जाते। यह रॉथचाइल्ड की असली चाल थी। उसने कर्ज को इतना ज्यादा लोगों में बांट दिया। इतने ज्यादा देशों में फैला दिया कि अब कोई एक गवर्नमेंट मना नहीं कर सकती थी। मना करने का मतलब था पूरी दुनिया का फाइनेंशियल सिस्टम तोड़ना। और वह कोई अफोर्ड नहीं कर सकता। 1815 में वाटरलू की लड़ाई हुई। नेपोलियन हारा। नेथन रॉथचाइल्ड को यह खबर लंदन में सबसे पहले मिली। उसके प्राइवेट मैसेंजर्स ब्रिटिश गवर्नमेंट से भी तेज थे। उसने इस खबर का फायदा उठाया और एक दिन में इतना पैसा कमाया जो आज के हिसाब से मिलियंस में होगा। कैसे? यह डिटेल हिस्टोरियंस में डिबेटेड है, लेकिन इतना पक्का है कि उसका इंफॉर्मेशन नेटवर्क उसे मैसिव एडवांटेज देता था। 1820 तक रॉथचाइल्ड फैमिली ने पूरे यूरोप के कर्ज पर कब्जा कर लिया। किसी भी गवर्नमेंट को उधारी चाहिए, रॉथचाइल्ड के पास जाना पड़ेगा क्योंकि इन्वेस्टर्स का नेटवर्क उनके पास था। डिस्ट्रीब्यूशन उनके पास था। टर्म्स वो डिसाइड करते थे और सबसे इंपोर्टेंट कोई गवर्नमेंट अब डिफॉल्ट नहीं कर सकती थी। मना करने का ऑप्शन ही खत्म हो गया। गवर्नमेंट्स फंस गई। उन्हें इंटरेस्ट भरते रहना था चाहे उनकी जनता भूखी मरे। और पुराने कर्ज का इंटरेस्ट भरने के लिए नया कर्ज लेना था। रॉथचाइल्ड ने तीसरा काम किया। कर्ज को ग्लोबल बना दिया। सबको एक दूसरे से जोड़ दिया। कर्ज का जाल अब सिर्फ परमानेंट नहीं था, यह अनइस्केपेबल हो गया। इससे भागना नामुमकिन हो गया। यह दूसरा जाल था। अब रुको एक सेकंड। रॉथचाइल्ड की बात हुई, मॉर्गन की बात होगी, लेकिन बीच में एक चीज समझो जो डायरेक्टली तुमसे जुड़ी है, अपने देश से, अपने खून से। जब रॉथचाइल्ड यूरोप में यह खेल खेल रहा था तब इंडिया में क्या हो रहा था? ईस्ट इंडिया कंपनी। 1600 में कुछ ब्रिटिश व्यापारियों ने एक कंपनी बनाई। नाम रखा ईस्ट इंडिया कंपनी। यह आए थे व्यापार करने, मसाले खरीदने, कपड़ा खरीदने, लेकिन धीरे-धीरे इन्होंने वही किया जो रॉथचाइल्ड ने किया। कर्ज का जाल। पैटर्न समझो। इंडिया उस वक्त छोटे-छोटे रजवाड़ों में बटा था। हर राजा अपने में आपस में लड़ते रहते थे। कंपनी ने कहा, राजा साहब, आप पड़ोसी से लड़ना चाहते हो, हम मदद करेंगे। हमारे सिपाही ले लो। पैसे की चिंता मत करो, हम दे देंगे। राजा खुश, जंग जीता। लेकिन अब कंपनी का कर्ज चढ़ गया। कंपनी कहती, राजा साहब, पैसा वापस करो। राजा के पास पैसा नहीं तो क्या करें? कंपनी कहती, कोई बात नहीं, अपने राज्य का कुछ हिस्सा दे दो या हम टैक्स कलेक्शन का हक ले लेंगे। और ऐसे एक-एक करके कंपनी ने पूरा हिंदुस्तान निगल लिया। अवध का एग्जांपल लो। अवध के नवाब ने कंपनी से कर्ज लिया। जब चुका नहीं पाया तो कंपनी ने अवध पर कब्जा कर लिया। नवाब को पेंशन पर बिठा दिया। राजा जी, आप राजा हो नाम के, असली मालिक हम हैं। 1857 की क्रांति हुई। लेकिन वो दबाई गई और ब्रिटिश क्राउन ने डायरेक्ट कब्जा ले लिया। अब कंपनी नहीं, ब्रिटिश सरकार सीधा इंडिया चलाएगी और तब शुरू हुआ असल लूट का खेल। हर रेलवे लाइन जो बनी, उसका खर्चा इंडिया के टैक्स से, लेकिन वो रेलवे किसने बनाए? ब्रिटिश कंपनीज ने। उन्हें गार्ंटीड मुनाफा दिया गया इंडिया के खजाने से। रेलवे इंडियंस के लिए नहीं थे। वो माल ढोने के लिए थे कॉटन फील्ड से पोर्ट तक रॉ मटेरियल इंग्लैंड जाए, फिनिश्ड गुड्स वापस इंडिया भेजे। बंगाल में 1943 में अकाल पड़ा। 20 से 30 लाख लोग भूख से मर गए। और उसी वक्त ट्रेन भर-भर के अनाज बाहर जा रहा था क्योंकि वो अनाज ब्रिटिश फौज के लिए रिजर्व था। हर सड़क जो बनी, उसका खर्चा इंडिया के टैक्स से। हर सरकारी बिल्डिंग जो बनी, इंडिया के टैक्स से। और इन सब पर इंटरेस्ट वह भी इंडिया के टैक्स से। जब इंडिया में आजाद हुआ, ब्रिटेन कहता था कि हमने इंडिया में इन्वेस्टमेंट किया है। रेलवेज बनाई, बिल्डिंग्स बनाई। इसका पैसा वापस चाहिए। और इंडिया के पास जो स्टर्लिंग बैलेंस थे। मतलब जंग के वक्त इंडिया ने ब्रिटेन को माल भेजा था। उसके जो पैसे बनते थे वो ब्रिटेन के पास जमा थे। वो पैसा ब्रिटेन ने तुरंत वापस नहीं किया। हम आजाद हुए, लेकिन खजाना खाली था। इकोनॉमिस्ट उत्सव पटनायक। उन्होंने कैलकुलेट किया कि ब्रिटिश ने इंडिया से कितना लूटा। 45 ट्रिलियन डॉलर। 45 ट्रिलियन यह आज की वैल्यू है। मतलब अगर आज ब्रिटेन वो पैसा वापस करे तो हर हिंदुस्तानी को लगभग ₹30,00,000 मिले। और कैसे लूटा? कर्ज के सिस्टम से, ट्रेड के सिस्टम से, टैक्स के सिस्टम से। यह वही सिस्टम है जो पैटर्सन ने बनाया, रॉथचाइल्ड ने फैलाया। बस रंग बदल गया। तरीका वही था और आज गोरा साहब सीधे नहीं आते। आईएमएफ आता है। वर्ल्ड बैंक आता है। लेकिन कर्ज वही है। ट्रैप वही है। यह समझना जरूरी है क्योंकि आगे जो मैं बताऊंगा वो इसी की कंटिन्यूशन है। अब मॉर्गन की बात करते हैं। तीसरा आर्किटेक्ट और यह सबसे पावरफुल है। अब तक क्या हुआ समझो। 1694 में पैटर्सन ने कर्ज को स्थायी बनाया। कर्ज अब हमेशा के लिए है। 1815 में रॉथचाइल्ड ने कर्ज को ग्लोबल बनाया। अब सारे देश एक दूसरे से जुड़े हैं कर्ज के जरिए। लेकिन एक लिमिट थी। उस जमाने में नॉर्मल बैंक्स होते थे जैसे एसबीआई है, एचडीएफसी है। यह बैंक्स लोगों का पैसा जमा करते थे और दूसरों को लोन देते थे। लेकिन यह बैंक सिर्फ उतना ही लोन दे सकते थे जितना पैसा उनके पास जमा था। उससे ज्यादा नहीं।

[20:46]तो गवर्नमेंट को भी उतना ही मिल सकता था जितना इन बैंक्स के पास था। लिमिट थी। तीसरे आर्किटेक्ट ने यह लिमिट तोड़ दी। उसका नाम था जेपी मॉर्गन। जॉन पीयर पॉन्ट मॉर्गन, अमेरिका का सबसे पावरफुल बैंकर। समझो क्या हुआ? 1900 तक अमेरिका एक बड़ी ताकत बन रहा था। फैक्ट्रीज लग रही थी, रेलवेज बन रही थी, स्टील प्लांट्स बन रहे थे। इकोनॉमी बढ़ रही थी। लेकिन अमेरिका का बैंकिंग सिस्टम बहुत बेसिक था। कोई सेंट्रल सिस्टम नहीं था। हर बैंक अपने आप में कोई एक जगह से कंट्रोल नहीं। और पैसों की सप्लाई वो सोने से जुड़ी थी। मतलब देश में जितना सोना है उतना ही पैसा छाप सकता है, ज्यादा नहीं। 1907 में एक क्राइसिस आई। हुआ क्या था? दो बिजनेसमैन थे अमेरिका में। अगस्त हाइन्स और चार्ल्स मॉर्स। इन्होंने सोचा कि कॉपर का पूरा मार्केट कॉर्नर कर लें। मतलब सारा कॉपर खरीद लो। फिर दाम बढ़ा के बेचो, करोड़ों कमाओ। प्लान फेल हो गया। दोनों का पासा डूब गया। प्रॉब्लम यह थी कि यह दोनों कई बैंक्स के बोर्ड में भी थे। जब लोगों को पता चला कि यह दोनों डूब गए तो उन्हें लगा कि यह बैंक्स भी डूबेंगे। सबसे बड़ा ट्रस्ट कंपनी था किनकरबोकर ट्रस्ट। यह इन लोगों से कनेक्टेड था। लोगों ने सुना और अपना पैसा निकालने बैंक के बाहर लाइन में खड़े हो गए। अब समझो बैंक तुम्हारा पैसा लॉकर में नहीं रखता, वो पैसा किसी और को लोन दे देता है। तो जब सब एक साथ पैसा मांगे, बैंक के पास होता नहीं। किनकरबोकर ट्रस्ट फेल हो गया। फिर लोगों को दूसरे बैंक्स पर भी भरोसा नहीं रहा। वो भी लाइन में खड़े हो गए। मल्टीपल बैंक्स फेल होने लगे एक के बाद एक ताश के पत्तों की तरह गिरते गए। पूरा सिस्टम गिरने वाला था। जेपी मॉर्गन ने देखा कि अगर यह बैंक फेल हुए तो पूरा सिस्टम गिर जाएगा। उसने क्या किया? उसने न्यूयॉर्क के सबसे बड़े बैंकर्स को अपने घर बुलाया, अपनी पर्सनल लाइब्रेरी में दरवाजे बंद कर दिए। उसने कहा कि कोई नहीं जाएगा जब तक हम इस क्राइसिस को सॉल्व नहीं कर लेते। उसने उन बैंकर्स को मजबूर किया कि अपना पैसा लगाएं फेलिंग बैंक्स को बचाने के लिए। पैसा इकट्ठा किया, क्राइसिस को रोक दिया। मॉर्गन एक इंसान ने पूरे अमेरिका की बैंकिंग सिस्टम को बचाया। लेकिन मॉर्गन 70 साल का था। वो जानता था कि यह दोबारा नहीं कर सकता। तो उसने और उसके साथियों ने सोचा एक परमानेंट सिस्टम चाहिए। ऐसा सिस्टम जो हमेशा क्राइसिस संभाल सके। ऐसा सिस्टम जो कभी पैसों की कमी ना आने दे। उन्हें एक सेंट्रल बैंक चाहिए था। याद है पैटर्सन ने बैंक ऑफ इंग्लैंड बनाया था। वो दुनिया का पहला सेंट्रल बैंक था। मॉर्गन चाहता था कि अमेरिका में भी वैसा ही सेंट्रल बैंक हो। सेंट्रल बैंक वो बैंक है जो बाकी सब बैंक्स का बाप हो, जो पैसा छापता है, जो डिसाइड करता है कि देश में कितना पैसा होगा। लेकिन एक प्रॉब्लम थी। अमेरिकन्स सेंट्रल बैंक से नफरत करते थे। अमेरिका पहले भी 2 बार सेंट्रल बैंक बनाया था। दोनों बार लोगों ने अपोज किया। यह अमीर बैंकर्स हम पे राज करेंगे बोलके बंद करवा दिया। तो मॉर्गन और उसके साथियों ने सोचा कि इस बार छुप के काम करना पड़ेगा। 1910 में एक सीक्रेट मीटिंग हुई। जगह थी जैकिल आईलैंड, जॉर्जिया एक प्राइवेट आईलैंड। वहां एक रिजॉर्ट था अमीर लोगों का। मॉर्गन खुद नहीं गया। उसके ट्रस्टेड लोग गए। जेपी मॉर्गन के बैंक्स के रिप्रेजेंटेटिव्स गए। अमेरिका के सबसे बड़े बैंक्स के लोग गए। लगभग एक हफ्ता उन्होंने वहां छुप के एक प्लान बनाया। सीक्रेट क्यों? क्योंकि अगर अमेरिका की जनता को पता चलता कि देश के सबसे अमीर बैंकर्स छुपके बैठ के डिसाइड कर रहे हैं कि देश का पैसा कैसे चलेगा तो हंगामा हो जाता। लोग रोड पे आ जाते। उन्होंने एक बहुत शातिर प्लान बनाया। सेंट्रल बैंक को सेंट्रल बैंक नहीं बुलाएंगे। नाम रखेंगे फेडरल रिजर्व सिस्टम। फेडरल यह वर्ड सुनकर लोगों को लगता है कि सरकारी है, गवर्नमेंट वाली चीज है। रिजर्व सुन के लगता है कि पैसा सेफ है, रिजर्व है। और सिस्टम, मतलब एक नहीं, कई बैंक्स है। डिसेंट्रलाइज्ड है, बिखरा हुआ है। दिखने में लगता था कि यह लोगों की चीज है, डेमोक्रेटिक है। लेकिन अंदर से 12 रीजनल फेडरल रिजर्व बैंक्स बनेंगी। लेकिन सब का असली कंट्रोल एक जगह से होगा फेडरल रिजर्व बोर्ड। और सबसे इंपॉर्टेंट, फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ न्यूयॉर्क। यह वॉल स्ट्रीट के सबसे बड़े बैंक्स कंट्रोल करेंगे मॉर्गन के बैंक्स। दिसंबर 1913 में यह बिल अमेरिका की कांग्रेस में आया। कांग्रेस मतलब अमेरिका की पार्लियामेंट। वही जगह जहां लॉज़ बनते हैं। इंडिया वाली कांग्रेस नहीं, अमेरिका की। बिल क्रिसमस हॉलिडेज से पहले लाया गया जल्दी-जल्दी। ज्यादातर रिप्रेजेंटेटिव्स को समझ नहीं आया कि यह क्या है और पास हो गया। फेडरल रिजर्व एक्ट बन गया। अब ध्यान से सुनो, यह सबसे इंपोर्टेंट पार्ट है। अब मैं तुम्हें स्टेप बाय स्टेप समझाऊंगा कि पैसा हवा से कैसे बनता है। इसको समझने के लिए पहले एक छोटा सा एग्जांपल लो। सोचो तुम्हारे गांव में एक किराने की दुकान वाला है। नाम है रमेश। तुम उसके पास जाते हो और बोलते हो, रमेश भाई, अभी पैसा नहीं है, उधारी में सामान दे दो। मैं महीने की 1 तारीख को दे दूंगा। रमेश एक बहीखाता निकालता है उसमें लिखता है रामू के ₹100 उधारी। अब सोचो क्या रमेश के पास एक्स्ट्रा ₹100 आ गए? नहीं। उसने सिर्फ अपनी कॉपी में लिख दिया कि रामू पर ₹100 का कर्ज है। लेकिन अब रमेश के हिसाब में एक एसेट आ गया है। उसके अकाउंट्स में लिखा है कि ₹100 आने वाले हैं। यह उसके लिए वैल्युएबल है। यह छोटा सा एग्जांपल है। अब इसको बहुत बड़ा कर दो फेडरल रिजर्व लेवल पे। स्टेप बाय स्टेप समझो। गवर्नमेंट को ₹100 चाहिए। गवर्नमेंट एक बॉन्ड बनाती है। यह वह कागज है जिसके बारे में रॉथचाइल्ड वाले सेक्शन में बताया था। गवर्नमेंट से यह बॉन्ड फेडरल रिजर्व खरीदता है। तो क्या उसके पास पहले से लॉकर में ₹100 पड़े होते हैं? क्या उसने ₹100 छापे? नहीं।

[26:54]फेडरल बैंक क्या करता है? वह अपने सिस्टम में एंट्री कर देता है। बैंक के रिजर्व अकाउंट में ₹100। बस कोई नोट नहीं छपा, कोई ट्रक नहीं चला, सिर्फ कंप्यूटर एंट्री। अब गवर्नमेंट के अकाउंट में बैलेंस है। गवर्नमेंट वो ₹100 खर्च करती है। कॉन्ट्रैक्टर को पेमेंट, तनख्वाह, सड़क, प्रोजेक्ट। अब ध्यान दो जब सरकार ₹100 ट्रांसफर करती है। सरकार के अकाउंट में ₹100 कट जाते हैं। कॉन्ट्रैक्टर के बैंक में ₹100 बढ़ जाते हैं। अब कॉन्ट्रैक्टर के पास ₹100 हैं। लेकिन अभी भी कोई नोट प्रिंट नहीं हुआ। वो पैसा अभी भी डिजिटल है। अब अगर कॉन्ट्रैक्टर एटीएम से ₹20 निकालता है। तभी बैंक फेडरल बैंक से कैश मांगता है। तभी नोट्स सर्कुलेशन में आते हैं। मतलब पहले पैसा रिजर्व था, फिर वो बैंक डिपॉजिट बना और कैश तभी बना जब किसी ने कैश मांगा। अब वो पैसा मार्केट में आ जाता है। लोग यूज करते हैं। यह रियल मनी बन गया। और वो बॉन्ड अब फेडरल रिजर्व के पास है। यह फेडरल रिजर्व की एसेट है। अब गवर्नमेंट को हर साल ₹5 इंटरेस्ट देना है फेडरल रिजर्व को। यह पैसा कहां से आएगा टैक्स से? तुम्हारे पैसों से। 10 साल बाद ₹100 वापस करने हैं। गवर्नमेंट के पास हैं क्या? नहीं। तो क्या करेगी? नया बॉन्ड इशू करेगी। नया कर्ज पुराने कर्ज को चुकाने के लिए नया कर्ज। और चक्कर चलता रहेगा। यह समझे? पहले लिमिट थी। बैंक के पास जितना पैसा है, उतना ही दे सकता था। अब कोई लिमिट नहीं। फेडरल रिजर्व हवा में से पैसा बना सकता है। गवर्नमेंट को कभी नहीं सुनना पड़ेगा। गवर्नमेंट जितना चाहे उधारी ले, फेडरल रिजर्व देता जाएगा। यह वह मैकेनिज्म है जो अनलिमिटेड कर्ज को पॉसिबल बनाता है। और इंटरेस्ट पेमेंट्स वो टैक्सपेयर से जाती हैं। लोग सुबह उठके काम पे जाते हैं, मेहनत करते हैं, टैक्स भरते हैं। वो टैक्स जाता है गवर्नमेंट के पास। गवर्नमेंट उस टैक्स का एक हिस्सा फेडरल रिजर्व को इंटरेस्ट के तौर पर देती है। मॉर्गन 1913 में मरा, उसी साल जब फेडरल रिजर्व बना। लेकिन उसकी लेगेसी वो मैकेनिज्म है जो इंश्योर करता है कि कर्ज का जाल ग्लोबल है और इससे भागना नामुमकिन है।

[29:38]जब देश चुका नहीं सकते तब भी उन्हें डिफॉल्ट नहीं करने दिया जाता। उन्हें रिफाइनेंस किया जाता है। हमेशा के कर्ज में डाल दिया जाता है और इंटरेस्ट बहता रहता है कर्ज देने वालों की तरफ। वही बैंक्स, वही संस्थाएं, वही सिस्टम जो पैटर्सन ने 1694 में शुरू किया था।

[30:57]यह 300 साल में बुना गया जाल है जिसमें आज पूरी दुनिया फंसी है। अब तक जो सुना वो इतिहास था। 300 साल पुरानी कहानी। लेकिन तुम सोचोगे ये सब तो बड़े-बड़े देशों की बात है, गवर्नमेंट्स की बात है। मुझे क्या फर्क पड़ता है? बहुत फर्क पड़ता है क्योंकि यह सिस्टम सीधा तुम्हारी जेब से जुड़ा है, तुम्हारी सैलरी से जुड़ा है, तुम्हारी जिंदगी से जुड़ा है। चलो अब देखते हैं कि ये सिस्टम तुम्हें पर्सनली कैसे अफेक्ट करता है। इंडिया की गवर्नमेंट हर साल बजट में कर्ज का इंटरेस्ट भरने के लिए पैसा रखती है। 2024-25 में यह लगभग 12 लाख करोड़ रुपये के आसपास है। ₹12 लाख करोड़ सिर्फ इंटरेस्ट। असली कर्ज नहीं, सिर्फ इंटरेस्ट। यह पैसा कहां से आता है? तुम्हारे टैक्स से। जीएसटी जो तुम हर चीज पर भरते हो, चाय पे, बिस्कुट पे, कपड़े पे, फोन पे। इनकम टैक्स जो तुम्हारी सैलरी से कटता है, पेट्रोल, डीजल पर जो टैक्स लगता है, यह सब पैसा गवर्नमेंट कलेक्ट करती है और उसका एक बहुत बड़ा हिस्सा कर्ज का इंटरेस्ट भरने में जाता है। मतलब समझो तुम सुबह चाय पीते हो, उस पर जीएसटी भरी। वो पैसा गवर्नमेंट के पास गया। गवर्नमेंट ने उस पैसे का कुछ हिस्सा कर्ज का इंटरेस्ट भरने में दिया। वह इंटरेस्ट किसी बैंक के, किसी इंस्टीट्यूशन के अकाउंट में गया। तुम जब पेट्रोल डलवाते हो और उस पर टैक्स भरते हो, वह पैसा अल्टीमेटली बॉन्ड होल्डर्स के पास जा रहा है। तुम डायरेक्टली नहीं देख पाते। तुम्हें लगता है कि टैक्स गवर्नमेंट को दे रहे हो डेवलपमेंट के लिए। सड़कें बनेंगी, स्कूल्स बनेंगे। लेकिन गवर्नमेंट वह टैक्स का एक बड़ा हिस्सा कर्ज के इंटरेस्ट में दे रही है। और कर्ज कभी खत्म नहीं होगा तो तुम हमेशा भरते रहोगे। यह लीगल ट्रांसफर है। तुम्हारी जेब से अमीर लोगों की जेब में हर साल, हमेशा के लिए। और अब एक और चीज समझो जो सबसे ज्यादा तुम्हें अफेक्ट करती है, महंगाई। यह इस पूरे सिस्टम का साइड इफेक्ट है। सोचो गांव में 100 किलो गेहूं है और ₹1000 हैं लोगों के पास। हर किलो ₹10 का होगा। अब कोई आकर ₹1000 और डाल दें। अब ₹2000 है। लेकिन गेहूं अभी भी 100 किलो है। हर किलो ₹20 का हो जाएगा। गेहूं वैसा का वैसा है, लेकिन पैसा ज्यादा हो गया तो दाम बढ़ गया। यही महंगाई है। और महंगाई तुम्हें कैसे अफेक्ट करती है? तुम्हारी सैलरी की वैल्यू कम हो जाती है। तुम्हारी सेविंग्स की वैल्यू कम हो जाती है। 10 साल पहले जो सामान ₹100 में आता था आज ₹300 में आता है। तुम्हारी सैलरी दोगुनी हुई, लेकिन चीजों के दाम 3 गुने हो गए। मतलब तुम 10 साल पहले से गरीब हो, चाहे तुम्हारी सैलरी बढ़ गई हो। यह वेल्थ ट्रांसफर है। धीरे-धीरे होने वाला, चुपके-चुपके होने वाला। तुम्हारे पॉकेट से उन लोगों के पॉकेट में जो एसेट्स रखते हैं। एसेट्स मतलब प्रॉपर्टी, जमीन, सोना, बॉन्ड्स क्योंकि महंगाई में एसेट्स की वैल्यू बढ़ती है, लेकिन सैलरी की वैल्यू गिरती है। अमीर और अमीर होता है क्योंकि उसके पास प्रॉपर्टी है जो ₹1 करोड़ की थी अब ₹3 करोड़ की हो गई। गरीब और गरीब होता है क्योंकि उसकी सैलरी ₹30,000 की थी, अब ₹50,000 की हो गई। लेकिन खर्चा ₹30,000 से ₹90,000 हो गया। और यह सिस्टम ने डिजाइन किया है। सेंट्रल बैंक पैसा प्रिंट करता है, महंगाई आती है। गरीब की खरीदने की ताकत गिरती है, अमीर की दौलत बढ़ती है। यह साइकिल रिपीट होती है हर साल, हमेशा के लिए। और एक और लेयर है जो स्पेसिफिकली तुम्हारी जनरेशन को टारगेट करती है। पर्सनल डेट, निजी कर्ज, ईएमआई कल्चर, क्रेडिट कार्ड्स अभी लो बाद में भरो। यह सब पैटर्सन के मॉडल का पर्सनल वर्जन है। सोचो तुम एक आईफोन खरीदना चाहते हो। ₹1,00,000 का है, तुम्हारे पास इतना पैसा नहीं। लेकिन दुकान वाला बोलता है ईएमआई पर ले लो। ₹5000 महीना 2 साल में खत्म। तुम्हें लगता है ₹5000 महीना यह तो मैं अफोर्ड कर सकता हूं। चल ठीक है। लेकिन रुको ₹5000 महीना 24 महीने। टोटल कितना हुआ? ₹1,20,000। फोन की कीमत थी ₹1,00,000। तुम भरे ₹1,20,000। ₹20,000 एक्स्ट्रा। यह इंटरेस्ट है। लेकिन अभी ईएमआई खत्म नहीं हुई कि नया फोन आ गया। भाई पुराना हो गया नया लेना पड़ेगा। फिर से ईएमआई। और सिर्फ फोन नहीं। ईएमआई पर लैपटॉप, ईएमआई पर बाइक, ईएमआई पर गाड़ी, ईएमआई पर एसी, ईएमआई पर फ्रिज, ईएमआई पर फर्नीचर, शादी का लोन ईएमआई पर, वेकेशन का लोन ईएमआई पर। हर चीज ईएमआई पर। एक-एक ईएमआई छोटी लगती है। 2000 यहां, 3000 वहां, 5000 इधर। लेकिन सब जोड़ दो तो तुम्हारी सैलरी का आधा हिस्सा या उससे ज्यादा ईएमआई में जा रहा है। तुम सोचते हो कि तुम चीजों के मालिक हो। आईफोन तुम्हारा है, गाड़ी तुम्हारी है। लेकिन असल में चीजों ने तुम्हें अपना गुलाम बना लिया है। तुम वो नौकरी छोड़ नहीं सकते जो तुम्हें पसंद नहीं, क्योंकि ईएमआई भरनी है।

[35:48]बॉस गाली दे, बेज्जती करे, तुम चुप रहो क्योंकि ईएमआई भरनी है। ईएमआई तुम्हारी आजादी का सबसे बड़ा दुश्मन है। और यह सिस्टम ने जानबूझकर डिजाइन किया है। बैंक्स को तुम्हारी ईएमआई से इंटरेस्ट मिलता है। सोते-सोते कमाई। कंपनीज को तुम्हारा खर्चा मिलता है। तुम खरीदते रहो। गवर्नमेंट को तुम्हारे खर्चे पे जीएसटी मिलता है। अब सोचो बड़े पिक्चर में। ये सिस्टम टूट क्यों नहीं सकता? क्योंकि अगर टूटेगा तो सब कुछ टूटेगा। अगर दुनिया के सारे देशों ने अपना कर्ज चुका दिया तो ग्लोबल मनी सप्लाई 65 से 70 प्रतिशत कम हो जाएगी। दुनिया में इतना पैसा ही नहीं बचेगा कि ट्रेड हो सके। सिस्टम जम जाएगा। तो कर्ज खत्म किया नहीं जा सकता। यह सिस्टम का हिस्सा है। यह फीचर है, बग नहीं। और कौन फायदा उठाता है? वह लोग और इंस्टीट्यूशंस जिनके पास बॉन्ड्स हैं। अमेरिका के $38 ट्रिलियन के बॉन्ड्स किसके पास हैं? अमेरिकन पेंशन फंड्स के पास, इंश्योरेंस कंपनीज के पास। फॉरेन गवर्नमेंट्स के पास जैसे चाइना और जापान। बैंक्स के पास, अमीर इन्वेस्टर के पास। यह लोग हर साल इंटरेस्ट कमाते हैं बिना कुछ किए। इंडिया के 170 लाख करोड़ के बॉन्ड्स किसके पास हैं? इंडियन बैंक्स के पास, एलआईसी के पास, म्यूचुअल फंड्स के पास, फॉरेन इन्वेस्टर्स के पास। यह लोग हर साल इंटरेस्ट कमाते हैं बिना कुछ किए।

[37:25]हर साल $1 ट्रिलियन से ज्यादा सिर्फ अमेरिकन डेट से। प्लस जापान से, यूरोप से, इंडिया से हर जगह से। यह ट्रिलियन डॉलर्स सालाना टैक्सपेयर से बॉन्ड होल्डर्स की तरफ जाता है। यह इंसानी इतिहास का सबसे बड़ा वेल्थ ट्रांसफर है। कंटीन्यूअस, लगातार। कुछ सेकंड के लिए भी नहीं रुकता। स्ट्रक्चरल, सिस्टम में बिल्ट इन है। और इनविजिबल। ज्यादातर लोगों को दिखता नहीं। क्योंकि इसे टैक्स नहीं कहा जाता। इसे डेट सर्विस कहा जाता है। इसे इंटरेस्ट पेमेंट कहा जाता है। लेकिन मैकेनिज्म वही है। कामगार भरते हैं, इंस्टीट्यूशंस कलेक्ट करती हैं और कर्ज कभी कम नहीं होता। अब एक आखिरी बात समझो। ये चारों आर्किटेक्ट्स पैटर्सन, रॉथचाइल्ड, मॉर्गन, वोल्कर। इन्होंने मिल के प्लानिंग नहीं की थी। ये अलग-अलग सदियों में जीते थे, अलग-अलग देशों में। एक दूसरे से मिले भी नहीं। लेकिन हर एक ने एक प्रॉब्लम को ऐसे सॉल्व किया जो बैंकर्स के फायदे में था। और हर सलूशन पिछले वाले पे बिल्ड हुआ। अब तुम पूछोगे बैंकर्स को इस सिस्टम से क्या मिलता है? सिंपल है। तुमने ₹100 का लोन लिया। तुम्हें ₹108 देने हैं। ₹8 इंटरेस्ट। बैंक ने वो ₹100 बनाए कहां से? कुछ नहीं से। एंट्री लिख दी। मतलब बैंक ने कुछ नहीं दिया और ₹8 कमा लिए। अब इसको करोड़ों में मल्टीप्लाई करो। ट्रिलियंस में मल्टीप्लाई करो। गवर्नमेंट्स पूरी दुनिया में हर साल $1 ट्रिलियन इंटरेस्ट भरती है। वो ट्रिलियन डॉलर्स जाते कहां है? बॉन्ड होल्डर्स के पास, बैंक्स के पास, फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस के पास। यह परपेचुअल इनकम है। हमेशा आती रहेगी जब तक सिस्टम है। इसीलिए यह सिस्टम बना। इसीलिए यह सिस्टम चालू है। इसीलिए यह सिस्टम कभी नहीं बदलेगा। और जो लोग बॉन्ड्स कंट्रोल करते हैं, जो डेट मैनेज करते हैं, जो इंटरेस्ट कलेक्ट करते हैं, वह सबसे ज्यादा फायदा उठाते हैं। गवर्नमेंट्स नहीं, टैक्सपेयर्स नहीं, बल्कि फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस। और यह है आखिरी सच्चाई। $38 ट्रिलियन का कर्ज उनके लिए कोई क्राइसिस नहीं है। यह उनका बिजनेस मॉडल है। कर्ज का हर एक डॉलर किसी की बैलेंस शीट पे एक एसेट है। उस पे इंटरेस्ट मिलता है। वह और कर्ज लेने के लिए कोलैटरल बन जाता है। और जब तक भरोसा बना रहे जब तक लोग माने कि गवर्नमेंट इंटरेस्ट भरेगी, चाहे असली रकम कभी ना चुकाए, तब तक सिस्टम चलता रहेगा। कर्ज का जाल पूरा हो चुका है। बाहर निकलना पॉसिबल नहीं है बिना पूरे फाइनेंशियल सिस्टम को तोड़े हुए। चार आर्किटेक्ट्स, तीन सदियां, एक सिस्टम और दुनिया का हर इंसान अब इसके अंदर फंसा हुआ है। अब तुम पूछोगे कि तो हम क्या करें? अगर सिस्टम से बाहर नहीं निकल सकते तो क्या बस हाथ पे हाथ धरे बैठे हैं? नहीं। यह सिस्टम तभी काम करता है जब तुम इसे समझते नहीं। जिस दिन तुमने इसे समझ लिया, तुम पहले से अलग हो गए। तीन चीजें याद रखो। पहली बात, जागरूकता सबसे बड़ा हथियार है। जब तक तुम्हें यह सिस्टम दिखता नहीं था, तब तक यह तुम्हें अंधा बना के चला रहा था। अब तुम्हें दिखता है। अब तुम डिसीजंस अलग ले सकते हो। यह नॉलेज तुम्हें सिस्टम के अंदर रहते हुए भी स्मार्टर बनाती है। दूसरी बात, कंज्यूमर मत बनो इन्वेस्टर बनो। सिस्टम कंज्यूमर्स को खाता है और इन्वेस्टर्स को खाता खिलाता है। कंज्यूमर वो है जो ईएमआई पे फोन खरीदे, क्रेडिट कार्ड पे शॉपिंग करे और पूरी जिंदगी इंटरेस्ट भरे। इन्वेस्टर वो है जो अपना पैसा काम पे लगाए, एसेट्स बनाए और इंटरेस्ट कमा के खाए। दोनों सिस्टम में है, लेकिन एक साइड पे कटर है, दूसरे साइड पे कुर्सी। जब तक तुम सिर्फ खरीदते रहोगे, तब तक तुम सिस्टम का फ्यूल हो। तुम जल रहे हो ताकि इंजन चले। जिस दिन तुम अपना पैसा इन्वेस्ट करना सीख जाओगे, एसेट्स बनाना सीख जाओगे, उस दिन तुम सिस्टम के उस तरफ आ जाओगे जहां इंटरेस्ट मिलता है। जहां से इंटरेस्ट जाता नहीं। यह शिफ्ट छोटा लगता है लेकिन यह लाइफ चेंजिंग है। सैलरी से जीने वाले मत बनो, एसेट से जीने वाले बनो। तीसरी बात, कुछ प्रैक्टिकल स्टेप्स। पहला, ईएमआई कम करो। जो चीज कैश में नहीं खरीद सकते, मत खरीदो। आईफोन की ईएमआई से बेहतर है कि 6 महीने बाद कैश में खरीदो। दूसरा, क्रेडिट कार्ड पे मिनिमम पेमेंट मत करो। पूरा बिल भरो या यूज मत करो। 42% इंटरेस्ट लीगल लूट है। तीसरा, सेविंग्स को कैश में मत रखो। महंगाई खा जाएगी। एसेट्स में डालो। प्रॉपर्टी, गोल्ड, म्यूचुअल फंड्स, स्टॉक्स। चौथा, इमरजेंसी फंड रखो। 6 महीने का खर्चा ताकि कभी मजबूरी में लोन ना लेना पड़े। पांचवा, वित्तीय शिक्षा लो। YouTube पर फ्री है, बुक्स में है। पैसा कैसे काम करता है यह समझो। छठवां, अपने बच्चों को सिखाओ। स्कूल में नहीं पढ़ाते तो तुम पढ़ाओ। सिस्टम नहीं बदलेगा, लेकिन तुम बदल सकते हो। सिस्टम के अंदर रह के स्मार्ट बन सकते हो। यह बोरिंग लगता है, यह मुश्किल लगता है, लेकिन यह तुम्हारी चेंज तोड़ सकता है। अब अंधे मत बनो दोबारा। अगर यह वीडियो तुम्हें कुछ नया समझाई, अगर तुमने आज कुछ ऐसा जाना जो पहले नहीं जानते थे, तो एक काम करो। यह वीडियो उस एक इंसान को भेजो जिसे तुम सोचते हो कि यह सुनना चाहिए। कोई दोस्त, कोई भाई, कोई अपना। तुम्हारा 1 शेयर एक शुरुआत हो सकती है।

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